(भाग 1 का बाकि) ________धन से लोगों को प्यार क्यों है?
धन से इसलिए भी लोगों का प्यार है क्योंकि वह अनेक तरह की सुरक्षा प्रदान करता है। उस पर आश्वस्त हुआ जा सकता है क्योंकि वह तो अमृत जैसा लगता है और यह भ्रम पैदा करता है कि वह सदा साथ रहेगा, परन्तु मानवीय सम्बन्धों में सदा स्थायित्व बना रहे इसकी भविष्यवाणी असम्भव है। मित्र का क्या भरोसा कल शत्रु हो जाये। नहीं तो यह भी हो सकता है उसमें से किसी एक की मृत्यु हो जाए। यदि प्रेम पर विश्वास भी कर लिया जाये तो मृत्यु पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है। क्योंकि वह तो बिल्कुल अनिश्चितता लिए हुए है। (अन-प्रोडिक्टेबल) इसलिए सम्बन्धों में सुरक्षा को लेकर सदा खतरा बना ही रहता है।
धन सम्पत्ति को अदली-बदली भी किया जा सकता है, उसे बेचा भी और खरीदा भी जा सकता है। एक टी.वी. के बदले दूसरा टी.वी. आ सकता है। एक मकान के बदले दूसरा मकान आ सकता है। एक कार से यदि आप उब गये तो उसे बेचकर दूसरी कार खरीदी जा सकती है। कार आपको झंझट में भी नहीं डालेगी कि आप उसे नहीं बेचें इसलिए उसके प्रेम मे पड़ना लोगों के लिए सहज है।
परन्तु एक मनुष्य के साथ ऐसा करना सम्भव नहीं। इस संसार में प्रत्येक मनुष्य अद्वितीय है। एक की तुलना दूसरे से हो ही नहीं सकती है। कार्य के लिए एक व्यक्ति की जगह दूसरा तो ले सकता है, परन्तु सम्बन्ध के साथ ऐसा कदापि नहीं किया जा सकता है। यदि किसी स्त्री का पति मर जाये तो पत्नी दूसरा पति नहीं बदल सकती, बेटे के बदले दूसरा बेटा नहीं बदला जा सकता है। यह बात अलग है कि पति को कोई गुलाम समझे या पत्नी को धन-सम्पत्ति, जैसा पहले समझा जाता था। तो इस अवस्था में वह सम्बन्ध नहीं वस्तु हो जाती हैं। वस्तु की तरह तो उसे बदल जा सकता है, परन्तु व्यक्ति की तरह नहीं। एक ही प्रकार की लाखों वस्तुएँ हो सकती हैं इसलिए उसके खालीपन को भरा जा सकता है, परन्तु एक ही प्रकार के लाखों व्यक्ति नहीं हो सकते इसलिए उसके खालीपन को भरा नहीं जा सकता है।
सबसे बड़ा गरीब कौन?
कहानी –– एक संन्यासी को कहीं से बहुत सम्पत्ति प्राप्त हुई। उसने नगर में घोषणा करवा दी कि जो सब से बड़ा भिखमंगा अर्थात् गरीब हो वह मेरे पास आ जाये मैं उसे यह सारी सम्पत्ति दे दूंगा। बहुत से लोग आये,
परन्तु उस संन्यासी ने किसी को भी वह सम्पत्ति नहीं दी उसका कहना था कि शर्त के अनुसार उसके पास इस नगर का सबसे बड़ा भीखमंगा अभी तक नहीं आया है। एक दिन नगर सेठ की सवारी संन्यासी के आश्रम के पास से गुजर रही थी। संन्यासी ने तक्षण सम्पत्ति का वह थैला उस सेठ की गाड़ी में उछाल दिया। सेठ थैली को देखकर बहुत ही क्रोधित हुआ क्योंकि संन्यासी द्वारा घोषित शर्त उसे मालूम थी।
उसने गाड़ी रुकवाई और क्रोधावेश में संन्यासी से कहा –– `कि तुम ने मेरा इतना बड़ा अपमान कैसे किया? क्या मैं नगर का सबसे बड़ा भीखमंगा हूँ?'
संन्यासी ने मुस्कुराकर कहा –– फिर इतनी बड़ी कंजूसी क्यों? क्या तुम अपने धन की तिजोरी को और बढ़ाने की प्रतिपल, कामना और प्रयास नहीं करते रहते हो, क्या परमात्मा से भी मंदिर में यही प्रार्थना नहीं करते रहते हो कि मैं कैसे और बढ़ा नगर सेठ बन जाऊँ।
उन गरीब भिखमंगे की आवश्यकता तो बहुत थोड़े धन से भी पूरी हो जाती, परन्तु तुम्हारी नहीं?
तुम्हें उन भिखमंगों से भी अधिक चाहिये, तुम्हारी माँग तो इस नज़र में सबसे बड़ी है। फिर बताओ, तुमने मेरी शर्त पूरी की या नहीं?
लोभ आ जाये, बस, मनुष्य में और किसी बुराई की ज़रूरत नहीं है। लोभी चाहे कितना ही धन का अम्बार लगा दे,
वह कंगाल ही रहता है। क्योंकि धन के साथ उसकी माँग बढ़ती चली जाती है। वह बेचारा सदा अभाव में ही जीता रहता है। फिर वह सुखी कैसे हो सकता है? इस जगत में कंजूस के सम्बोधन से बड़ी कोई गाली नहीं, और कंजूस से बढ़कर कोई कुरूप भी नहीं क्योंकि वह पदार्थ के प्रेम में पागल हैं। मनुष्य की समस्त गरिमा के मूल में उसका आत्मवान होना उसका चेतन्य होना ज़रूरी है। वस्तुएँ तो जड़ हैं, मुर्दा हैं, उसमें कोई अपना प्राण नहीं। वह हमारे नीचे हैं।
हम पदार्थ के ऊपर खड़े हैं। यदि हम पदार्थ से प्रेम करते हैं तो हम भी नीचे हो गये क्योंकि हम अपने से नीचे की चीज़ों से प्यार करने लगे हैं। जब भी कोई किसी को नीच कहता है तो इसका वास्तविक अर्थ यही है कि वह मनुष्यता से नीचे की वस्तु के प्यार में फंस गया। वैसे यह प्रेम भी गजब का रसायन है। जिसके साथ भी हम प्रेम पूर्ण सम्बन्ध बनाते हैं तक्षण उसके अनुकूल हमारा रूपान्तरण होने लगता है क्योंकि एक अर्थ में हमने अपने को उसके हाथ में अर्पित कर दिया है।
ना सिर्फ हमारा आन्तरिक रूपान्तरण होता है, अपितु बाह्य आकृति में भी उसके अनुकूल समानता दिखने लगती है। वस्तुओं के प्रति प्रेम उसे न कि लोभी वृत्ति वाला बना देता है, परन्तु लार टपकता हुआ उसका चेहरा भी शान्त व्यक्ति के चेहरे से भिन्नता लिए हुए होता है। जैसे अलग-अलग, देश-प्रदेश के व्यक्तियों का सामूहिक चेहरा भी दूसरे प्रदेश के निवासी से अलग होता है। यह समानता उस वातावरण और संस्कृति के लगाव के कारण उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिक ने तो दो प्रेमियों के बीच अटूट तादात्म्य होने से उनके चेहरे मे भी एकरूपता पाई है। माँ बाप बच्चे के चेहरे में समानता के अन्तर सम्बन्धों में अत्यन्त रहस्यपूर्ण जानकारियाँ हासिल की गई हैं जो सिर्फ प्रेम की एकात्मभाव की दशा में ही प्रगट होते हैं।
वस्तुओं से प्रेम करते ही मनुष्य वस्तुओं के समान हो जाता है। इसलिए कंजूस जैसा ओछा कृत्य करता है वैसा दूसरा नहीं। तभी तो कंजूस को मक्खीचूस कहा जाता है। कहावत है –– `कहाँ राजा भोज,
कहाँ गंगू तेली'। तो कहाँ आनन्द स्वरूप, प्रेम और प्रकाश स्वरूप आत्मा और कहाँ छोटी और ओछी वस्तु। कृपणता मानवता की परिभाषा के कहीं नज़दीक भी नहीं आती है। उसका दिल तो दौलत के नीचे ही दबा रहता है। उसकी सम्पत्ति तो हिंसा बेईमानी और झूठ के लहू से लिथड़ा हुआ होता है। लोभी मनुष्य का कर्म और जीवन आनन्द सृजन का महोत्सव नहीं होता अपितु शोरगुल और अशान्ति से भरा वस्तुओं का बाजार मात्र है,
जहाँ खरीद-फरोख्त और चीज़ों का संग्रह होता रहता है और अंत में सबकुछ राम नाम सत हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि `मनुष्य लोभ का प्याला पीकर मूर्ख और दीवाना हो जाता है'।
वस्तुओं से प्यार करने वाले ऐसे परिग्रहीचित्त वाला व्यक्ति जीवन जीने के लिए धन-सम्पत्ति का आयोजन करता रहता है कि यदि कल यह सभी चीज़ें तथा इतना रुपया इकट्ठा हो जाये तो वह आराम की, मौज की ज़िन्दगी जियेगा। वर्तमान जीवन का जीना तो वह स्थगित ही कर देता है। वह सदा यही सोचते रहते हैं कि कल भविष्य में जब ठीक-ठीक बैंक बैलेन्स हो जाये,
कार-बंगला इत्यादि का इन्तजाम हो जाये फिर जी लेंगे।
लेकिन धन के पागल प्रेमी अतीत के ऐसे ही बड़े-बड़े पागलों जैसे सिकंदर, नेपोलियन, चंगेज, तैमूर इत्यादि लोगों से भी यह नहीं सीखते हैं कि किसी के जीवन में ऐसा सुनहरा मौका कभी भी नहीं आता है। जब ऐसे इतिहास पुरुषों का नहीं, सिकंदर का भी नहीं आया फिर आप इस भ्रम को क्यों पाले बैठे हो कि आप अपवाद बन जायेंगे।