(भाग
3 का बाकी)
तनाव क्या है?
किसी भी घटना या
परिस्थिति का किसी व्यक्ति
के शरीर और मन
पर जब कोई विशिष्ट
प्रतिक्रिया या प्रभाव उत्पन्न
होता है तो उसे
तनाव कहा जा सकता
है। चाहे वह प्रतिक्रिया
अति खुशी की दशा
में किसी का हार्ट
फेल क्यों न कर
दे?
इस प्रकार उसका प्रभाव
जो शरीर पर दृष्टिगोचर
होता है, वह है
माँसपेशियों में तनाव का
बढ़ जाना, लिम्फ नोड
का छोटा हो जाना
Cortisol का बहुत
अधिक मात्रा में स्त्राव
(Secreate) होना इत्यादि
जो भी उत्तेजना शरीर
पर इस प्रकार का
प्रभाव उत्पन्न (Stimulus Response) करती है, तनाव
कहलाता है। जिसे प्रोफेसर
हेन्सले ने (Stressed out) अत्यधिक तनाव
शब्द दिया और इसकी
जो विधि बताई उसका
नाम दिया है –– General Adaption syndrome (G.A.S.), जो तनाव
के क्षेत्र में बहुत
प्रसिद्ध हुआ।
जैसे ही आपके अन्दर
तनाव बढ़ना शुरू होता
है अन्दर से एक
सिग्नल मिलना प्रारम्भ हो
जाता है, परन्तु हम
उसे
Alarm की
तरह वैसे ही अनसुना
कर देते है जैसे
कोई Student चार बजे पढ़ने के
लिए सोने के समय
का एलार्म लगाकर सोता
है। परन्तु 4 बजे सुबह
नींद का प्रभाव प्रबल
होने या आलस्य की
प्रधानता के कारण बजते
एलार्म को अनसुना कर
या बन्दकर वापस सो
जाता है। फिर दिन
में उसे अपने समय
के सदुपयोग नहीं करने
का पश्चाताप होता है।
इसे एक-दूसरे ढंग
से समझें आपको कोई
बीमारी हो रही है।
शरीर तनाव ग्रस्त हो
रहा है तो वह
आवश्यक संदेश लक्षण के
रूप में प्रगट करता
है। यदि आप उसे
अनसुना कर देते हैं
तो वह अपना एलार्म
बन्द कर देते हैं।
आपकी आन्तरिक परिस्थिति उसे
Adapt कर
लेती है अर्थात् आपके
अन्दर प्रतिरोधी शक्ति बढ़
जाती है और बीमारी
चली जाती है।
कुछ समय के सभी
लक्षण प्रकट होने बंद
हो जाते हैं। यह
समय विधि 2-4-6-8 साल
भी हो सकती है, परन्तु
आन्तरिक नुकसान चलता रहता
है। एक समय आता
है जब बीमारी आपके
उस अंगविशेष को या
पूरे शरीर को ही
नष्ट कर देती है।
इस प्रकार ईर्ष्या, नफरत, क्रोध इत्यादि
मानसिक आवेगों का भी
प्रभाव उपरोक्त तरीके से
शरीर और ब्रेन को
नष्ट कर देता है।
इसका उदाहरण Frog Syndrome से लें।
मेढ़क में एक विशेषता
होती है। बाहर के
वातावरण के अनुसार वह
अपने शारीरिक तापमान को
व्यवस्थित कर लेता है।
प्रयोग में यह पाया
गया कि यदि आप
एक मेढ़क को एक
पानी से भरे बर्तन
में रख दें और
उसे धीमी आँच पर
चढ़ा दें तो जैसे-जैसे
बर्तन का पानी गर्म
होने लगेगा वैसे-वैसे मेढ़क
अपने शारीरिक तापमान को
पानी की गर्मी से
समायोजित करने लगता है।
धीरे-धीरे Adoption की प्रक्रिया के तहत
वह यह भूल ही
जाता है कि उसके
शरीर का तापमान इतना
बढ़ता जा रहा है
कि वह मर भी
सकता है। उसे अब
पानी से बाहर छलांग
ले लेना चाहए, परन्तु वह
पानी से बाहर नहीं
निकल पाता है और
मर जाता है। यदि
इससे भी आधे तापमान
के पानी में उसे
बाहर ठंडे जल से
निकाल कर एकाएक गर्म
पानी में डाला जाए
तो वह तुरन्त गर्म
जल से बाहर छलांग
लगा देगा।
गलत जीवन प्रणाली का
दुष्प्रभाव प्रारम्भ में हमें
इसलिए पता नहीं चलता
है कि हमारी Coping capacity या कोशिकाओं
में सुरक्षित जीवन-शक्ति बहुत
अधिक होती है। जिसे
आप सन्तुलन की तरह
भी समझ सकते हैं।
इसलिए समाज में आपको
ऐसे कई लोग जो
किसी न किसी दुर्व्यसन
के शिकार हैं, यह कहते
हुए मिल जायेंगे कि
अरे,
हमारे ऊपर शराब का, तम्बाकू
इत्यादि नशीली वस्तुओं को
कोई भी प्रभाव नहीं
पड़ता है। हम तो
शंकर जी की तरह
सभी प्रकार से विषों
का पचा जाते हैं।
कुछ लोगों के लिए
चीनी और नमक नुकसानकारी
होता है फिर भी
वे उसका परहेज नहीं
करते जैसे डायबिटिक व्यक्ति
के लिए चीनी से
परहेज करना तथा हाई
ब्लडप्रेशर वाले के लिए
नमक से, परन्तु ऐसे
बेपरवाह व्यक्ति अलबेलेपन के
वश यही कहते हुए
चलते रहते हैं। जिस
दिन भी किसी व्यक्ति
की यह संचित शक्ति
समाप्त हो जाती है
तक्षण (Symptoms) लक्षण प्रगट होने लगते
हैं। तनाव का यह
पहला कदम है। आगे
की वस्तु-स्थिति की
व्याख्या हमने उपरोक्त भाग
में कर दी है।
यदि किसी व्यक्ति के
सामने तनाव की समस्या
आ भी जाये तो ज़रूरी
नहीं कि वह किसी
बीमारी का शिकार हो
ही जाये। क्योंकि यदि
तनाव मिटाने के लिए
वह कोई प्रयास करता
है और उसमें उसे
सफलता मिल जाती है
तो उसका तनाव मिट
जाता है, परन्तु यदि
दूसरा व्यक्ति तनाव की
उस परिस्थिति से निकलने
के लिए कोई भी
प्रयास करके सफलता हासिल
नहीं कर पाता है
तो तनावजन्य प्रभाव के
लक्षण शरीर ओर मन
पर प्रगट होने लगते
हैं। वैज्ञानिकों ने
चूहे के भिन्न-भिन्न ग्रुप
पर अप्राकृतिक तनाव
उत्पन्न कर इस तरह
के परिणामों को सिद्ध
कर लिया है।
परिस्थिति एक जैसी तनाव
पूर्ण हो फिर भी
आप देखेंगे समाज में
दो या उससे अधिक
लोगों पर उसका प्रभाव
अलग-अलग
पड़ता है। इससे यह
बात सिद्ध होती है
कि परिस्थिति से ज़्यादा
महत्त्वपूर्ण किसी व्यक्ति की
स्थिति हो सकती है
अर्थात् उसका आन्तरिक सामर्थ्य
कितना प्रभावशाली है।
तनाव की परिस्थिति आपके
नियंत्रण में बनी रहे
इसके लिए आवश्यक है
आप अपना दृष्टिकोण जीवन
के प्रति सकारात्मक बना
लें। साधारणत हमारी आन्तरिक
परिस्थिति उस समय दो
अवस्था में हो सकती
है।
पहला (Thought leed to feeling) विचार भावना
का नियंत्रण करते हैं
(Thoughts are under our control) विचार हमारे
नियंत्रण में हों। किसी
भी अनुभूति का मौलिक
आधार अचेतन में कोई-न-कोई
विचार का होना ही
होता है। अवसाद ग्रस्त
लोगों पर डाक्टरो ने
सम्मोहन के द्वारा इस
तथ्य का पता लगाया
है कि वास्तव में
इस अवसाद का कारण
उसके अन्दर बचपन में
या कभी न कभी
किसी मानसिक या शारीरिक
आघात के कारण उत्पन्न
विचार है। जैसे ही
आदेश या सूचना द्वारा
उन विचारों को हटा
दिया गया तक्षण व्यक्ति
अवसाद से मुक्त हो
गया।
दूसरा तथ्य है कि
कुछ लोग शारीरिक रूप
से चोट ग्रस्त या
बीमार पड़ जाते है
फिर भी उनकी पहला
Caping demand अधिक होने
के कारण यदि आप
उनसे पूछेंगे कि आप
कैसा महसूस करते हैं
तो वे यही कहेंग
कि मैं अच्छा हूँ
और अच्छा महसूस कर
रहा हूँ कर्मों का
एक हिसाब-किताब था
जो अब ठीक हो
गया है। शारीरिक पीड़ा
है ठीक हो जायेगी
कोई ऐसी बात नहीं।
अर्थात् कष्टकर परिस्थिति में
भी विचार उसके नियंत्रण
में हैं।
तनाव मुक्त होने के
लिए दोनों ही परिस्थिति
में आपके विचारों का
महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसलिए
यदि विचार आपके नियंत्रण
में हो तो तनाव
का कोई भी कारण
आपको प्रभावित नहीं कर
सकता। विचार नियंत्रण की
अनेक विधियों का पूरे
किताब में जहाँ-तहाँ वर्णन
है। आप उसका अभ्यास
कर सकते हैं। ध्यान, साकारात्मक
चिन्तन, सकारात्मक सुझाव प्रभु-चिन्तन
इत्यादि हैं।
आपका तनाव अचेतन से
आ रही वह संदेश वाहिकाएँ
हैं जो आपको मित्रवत
इशारा कर रही हैं
कि इसे जाने और
इससे मुक्ति पाएं। भय, निराशा, चिन्ता, शारीरिक
दर्द आपके बन्द दरवाजे
पर धीरे-धीरे दस्तक
दे रहा है। इससे
घबराने की ज़रूरत नहीं
है। यदि आप ईर्ष्या
से परेशान हैं तो
अपनी सोच में सुधार
लाइए।
पड़ोसी की उपलब्धियों पर, चाहे
उसके धन, मान, यश में
वृद्धि हो रही हो, प्रसन्नता
का अनुभव कीजिये, ईर्ष्या की
कोई बात नहीं है।
वहाँ ईर्ष्या को भी
मित्रवत मिलिये तथ्य को
स्वीकारिये और चुनौतीपूर्वक अपने
सकारात्मक प्रयास से उसे
पराजित कर दीजिए। इसलिए
कहते हैं तनाव को
Meet, Greet और Beat कीजिए। तनाव
के बहुत से कारण
तो भूत और भविष्य
का चिन्तनमात्र हैं।
ना तो भूतकाल की
किसी गलती के बारे
में सोच-सोच कर
अपराध बोध को महसूस
कीजिये और ना ही
परिणाम का डर जो
भविष्य में होगा, उसका चिन्तन
कीजिए। (शेष भाग 5 पर)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें।
आपका और आपके
परिवार का यहाँ
तहे दिल से
स्वागत है


