(भाग 4 का बाकी)
तनाव मुक्ति के लिए विचार शक्ति का प्रबन्धन
साधारणत मनुष्य सारे दिन में 30 से 50 हज़ार तक विचार करता है एक साथ समान्तर कई विषयों पर विचार चलते रहते हैं। जिसका प्रभाव लगभग 75 से 80 ट्रिलियन कोशों पर पड़ता है। यदि विचार नकारात्मक है तो उसका नकारात्मक प्रभाव सभी (Cells) कोषों पर पड़ता है इसके लिए सफल और प्रसन्न जीवन के लिए विचारों के समुचित प्रबन्धन की कला का सीखना अति आवश्यक है। मुख्य रूप से विचार को 7 भागों में रखा जा सकता है ––
1. घातक विषैले विचार।
2. नकारात्मक विचार।
3. व्यर्थ विचार।
4. आवश्यक विचार।
5. सकारात्मक विचार।
6. उच्चतम विचार।
7. निसंकल्पता अर्थात् विचार शून्य जागरुकता
1. घातक विषैले विचार
ऐसे विचार जिसका विषैला प्रभाव इतना खतरनाक हो सकता है कि किसी की मृत्यु तक सम्भव है। इस विचार श्रेणी में ईर्ष्या, द्वेष, बदला, घृणा, क्रोध, भय इत्यादि भाव वाले विचार आते हैं जिसका प्राणन्तक प्रभाव स्वयं तथा दूसरे, दोनों पर ही पड़ता है। इसका रासायनिक प्रभाव इतना ज़हरीला होता है कि यह खून को विषमय बनाकर अनेक भयंकर बीमारी को उत्पन्न करने का कारण बन जाता है। ऐसे खतरनाक प्रभाव को उत्पन्न करने वाले विचार को तो हमें अपने जीवन से किसी भी तरह शून्य कर देने का प्रयत्न करना चाहिए। भय और क्रोध तो अत्यन्त घातक और विषैला है, इसलिए भय मुक्ति अत्यन्त आवश्यक है।
2. नकारात्मक विचार
इस विचार का प्रभाव उतने तीव्र और भयंकर तो नहीं होते हैं जितने विषैले विचार के, परन्तु इसका नुकसानकारी प्रभाव भी अप्रत्यक्ष रूप से हमारे मन और शरीर पर अवश्य पड़ता है।
उदाहरण : एक दिन मैं अपने एक व्यवसायी मित्र के घर आमत्रित था। वे कुछ उदास लग रहे थे। कारण पूछने पर उनकी पत्नी ने कहा इनका नुकसान तो कुछ नहीं हुआ। कुल कारण इतना ही है कि जहाँ 10 लाख का फायदा होना था वहाँ
4 लाख ही मिला। उस 6 लाख को ये नुकसान बता रहे हैं। 4 लाख की उन्हें खुशी नहीं है। इसे कहते हैं लाभ के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण। महान् विचारक मार्क रेरेलियस के इस सम्बन्ध में बहुत ही अच्छा कहा है –– ``आपका जीवन वैसा ही हो जाता है जैसे आपके विचार होते हैं''। किसी से अपनी तुलना करना भी नकारात्मक विचार के अन्दर आता है। हमें सदा अपने इस तरह के निम्न स्वमान से मुक्त रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी अलग पहचान है और यह पहचान उसकी भिन्न-भिन्न विशेषताओं के कारण है। हो सकता है कि कुछ बातों में आप दूसरे से कम हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि आप अपने को उससे तुलना कर हीनता के भाव से ग्रसित हो जाएँ। यदि आप अपनी विशेषता को ढूँढ़ेंगे तो आप पायेंगे कि कुछ बातों में आप उनसे बढ़-चढ़ कर हैं इसलिए सदा अपने स्वमान के विचार को ऊँचा रखें।
उदाहरण : अमेरिका के एक प्रसिद्ध विक्रयकर्त्ता-प्रशिक्षक `जिग जिगलर' ने एक बहुत अच्छी पुस्तक लिखी जिसका नाम था –– अपने को सदा ऊँचाई पर देखें, जिसमें उन्होंने अपने बारे में बताया कि उन दिनों जब वे Salesman के रूप में कार्य करते थे काफी असफल थे। वे उतना भी नहीं कर पाते थे जितनों की अपेक्षा उनसे Company रखती थी। इसके कारण सदा उन्हें अपनी क्षमता पर शंका बनी रहती थी और वे हतोत्साहित रहते थे। एक दिन कम्पनी मैनेजर ने प्रतिभाशाली जिग जिगलर के पास आकर कहा मैं देखता हूँ तुम्हारे अंदर अपार आन्तरिक शक्ति है। तुम चाहो तो कुछ भी कर सकते हो। मात्र इस एक संकल्प ने उनके जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन लाकर उन्हें Top sales trainer के स्थान में उपस्थित कर दिया। यदि ऐसा नकारात्मक विचार वाला व्यक्ति भी एक सकारात्मक सोच से इतनी ऊँचाईयों को छू सकता है फिर आप तो शायद उससे कहीं आगे हैं।
उदाहरण : 14 वर्ष के एक लड़के को क्लास टीचर ने कहा मैं देखता हूँ तुम्हारी बौद्धिक क्षमता (I.Q.) इतनी कम है कि तुम (S.S.C.) की परीक्षा तक उनीर्ण नहीं हो सकते हों। यह सुनते ही उसने निराश होकर पढ़ाई छोड़ दी। आपको आश्चर्य होगा 17-18 साल तक वह अति साधारण जीवन जीता रहा और होटल के बैरे आदि की नौकरी करता रहा। (I.Q.) परीक्षण करने वाले एक ग्रुप ने जब उसकी बुद्धि परीक्षा की तो पता चला कि उसकी बौद्धिक क्षमता असाधारण रूप से अत्यधिक है। 35 वर्ष के बाद वापस उसने पढ़ाई-लिखाई प्रारम्भ कर दी। आगे वह मात्र लेखक ही नहीं बना अपितु एक Society जिसका नाम International Association of Mansa के सर्वोच्च अध्यक्ष पद तक पहुँचा। शायद आपको पता हो इस Society की सदस्यता के लिए एक ही योग्यता की आवश्यकता है। और वह है आपका I.Q.I. बौद्धिक अंक कम-से-कम 140 तक होना चाहिए।
इसलिए सुबह से शाम तक इस बात का ख्याल बना रहे कि अपने अन्दर किसी भी नकारात्मक विचार को नहीं चलने दें। सदा सकारात्मक तथा उमंग उत्साह के विचार को ही स्थान दें। (शेष भाग 6 पर)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें।
आपका और आपके परिवार का यहाँ तहे दिल से स्वागत है


