3. व्यर्थ विचार
वे विचार जिसमें किसी भी प्रकार की सृजनात्मकता नहीं है। जो न तो सीखने योग्य है और न सिखाने योग्य जो स्मृति पर भार स्वरूप है तथा व्यर्थ में समय बर्बाद करते हैं, जिसे करने से, व्यर्थ बोलने और सोचने की आदत का निर्माण होता हो, उसे अर्थहीन विचार कहते हैं। ऐसे बिना सिर-पैर के विचार से भयंकर नुकसान तो नहीं होते है परन्तु वे धीरे-धीरे हमारी आन्तरिक शक्तियों को क्षीण करते रहते हैं। इससे भी हमें अपने को बचाना चाहिए।
4. आवश्यक विचार
जैसे कर्म के बिना जीवन सम्भव नहीं, वैसे ही आवश्यक विचार के बिना भी जीवन सम्भव नहीं। वे विचार जो सभी प्रकार की ज़िम्मेवारियों से जुड़े हों, चाहे वह पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा स्वयं की भौतिक प्रगति से हो या आध्यात्मिक प्रगति से हो, ज़रूरी विचार है। परन्तु देखना यह है कि आवश्यकता के नाम पर वे दूसरे हानिकारक या अनावश्यक विचार जीवन से जुड़ तो नहीं जाते हैं। जैसे किसी विशेष व्यक्ति या पहलू की चर्चा या विश्लेषण से विचार शुरू होते हो और वह निन्दा, परचिन्तन, ईर्ष्या इत्यादि पर पहुँच जाते हों।
आवश्यक विचार में भी इस बात का ध्यान हो कि आप जितना कम सोचेंगे उतनी ही आपकी शक्ति की बचत होगी। मान लीजिए आप भोजन करने बैठे, स्नान करने गये या अब तैयार होकर ऑफिस जाने के लिए बस में बैठ गये हैं। जहाँ आप 1 घण्टा तक स्वतंत्र हैं। इस दौरान, अब आपको विचार करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। फिर भी आदत वश आप सोचते रहते हैं और अपनी आन्तरिक शक्तियों का व्यय करते रहते हैं। इसके लिए थोड़ा-थोड़ा जागरुकता का अभ्यास ज़रूरी है।
जैसे मान लीजिए, आप भोजन कर रहे हैं तो धीरे-धीरे भोजन के साथ आप स्वाद का अनुभव करें,
अपने इस कृत्य का अवलोकन करें। जो भी कार्य कर रहे हैं उस समय मन अर्थात् विचारों में भी वहीं उपस्थित रहें। ऐसे जागरुक क्षणों में आपको अद्भुत आनन्द और निर्विचार भाव का अनुभव होगा। अनन्त दिशाओं में कर्म के प्रति इस जागरुकता के अनेक फायदे हैं। एक घण्टा बस आप ध्यानपूर्ण अवस्था में अद्भुत शक्ति का संचय कर सकते हैं जो आपके कार्य क्षेत्र पर आपको मददगार साबित होगी। ऐसे सारे दिन के किसी भी खाली क्षणों में विचार को समुचित प्रबन्धन की कला आपको अद्भुत शक्तियों से भर सकता है।
5. सकारात्मक विचार
सकारात्मक विचार का अर्थ है सभी हानिकारक स्थितियों में भी आशा और उमंग-उत्साह के विचार को कायम रखना। पूरी किताब में इसी सकारात्मक पहलुओं का विस्तार से विश्लेषण है। इसे ही हम सही विचारधारा भी कहते हैं। सदा समस्याओं के बीच समस्या स्वरूप नहीं बल्कि समाधान स्वरूप बने। अपनी 15 प्रतिशत समस्या का 80 प्रतिशत नहीं परन्तु 2 प्रतिशत बना दीजिए। राई को पहाड़ नहीं अपितु रूई बना दीजिए।
6. उच्चतम विचार
इस विचार को आध्यात्मिक विचार की श्रेणी में रखा जाता है। इस विचार का सम्बन्ध मानवीय उच्च चेतना से है। आध्यात्मिक विचार उपरोक्त सभी विचारों से,
गुणात्मक रूप से भी भिन्न है। जहाँ एक ओर विषैले विचार शरीर के लिए अत्यधिक घातक है वहीं आध्यात्मिक विचार शरीर और मन के लिए अत्यन्त पोषक है। नींद के 2 घण्टे में शरीर जितना विष विसर्जित करता है वही काम आध्यात्मिक विचार आनन्द उत्पन्न करने के कारण उस विसर्जन के आधे घण्टे में पूरा कर देता है।
ध्यान के क्षणों में हमारे शरीर और मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता अप्रतयाशित रूप से बढ़ जाती है। ऐसा तो अभी श्ग्म्aत् एम्गहम भी सिद्ध कर रहा है। राजयोग से दूसरे रसायन जैसे दर्द निवारक रसायन श्दज्प्ग्ह तथा आनंदोत्पादक रसायन का स्त्राव बढ़ जाता है जो अप्राकृतिक रसायन से 50 गुना अधिक प्रभावी होता है।
7. निसंकल्पता अर्थात् विचार शून्य जागरुकता
यह स्थिति आध्यात्मिक विचार के आगे की सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति है। यह वह अप्रभावी, प्रतिक्रिया मुक्त अवस्था है जहाँ मनुष्य मान-अपमान, निन्दा-स्तुति, हानि-लाभ, जय-पराजय, सुख-दुःख सभी द्वन्दात्मक परिस्थितियों में भी अनिर्णय और शान्त स्थिति में रहता है।
सभी प्रतिक्रियाओं से पार सदा तटस्थ और निष्पक्ष रह अत्यधिक शक्तिशाली मानसिक दिव्यता में प्रवेश कर जीवन में आत्मा का अनुभव करता है।
तनाव मुक्ति का आधार –– भय मुक्ति
जी हाँ,
इस तथ्य से आप अच्छी तरह अवगत हैं कि भय से काँपते चित्त में आनन्द के प्रकम्पन पैदा नहीं हो सकते हैं। जो कांपता है वह स्थिर कैसे होगा?
और जो स्थिर नहीं है,
स्वभावत वह अशान्त होगा ही। फलत जीवन अशान्ति, दुश्चिन्ताओं का केन्द्र बन जाता है। साधना के मंगल मार्ग में भय सबसे बड़ा गति-अवरोधक है।
जीवन में अनेक सुखद-दुःखद अनुभूति की स्मृतियों का भार ढोना मानव मन की दुर्बलता ही तो है जो तनाव के भयभीत कर जीवन को अशान्त कर जाता है, मनुष्य के प्रखर-चिन्तन और तेजस्वी कर्त्तव्य-शक्ति को पंगु बना जाता है और उसके आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग अवरुद्ध कर जाता है।
भले ही वह सत्य ज्ञान हमें है कि –– ``आत्मा अविनाशी है''
शरीर विनाशी है, सृष्टि-ड्रामा में सब कल्याणकारी है, सर्व सम्बन्धों से परमात्मा सदा सहयोगी है इत्यादि-इत्यादि। फिर भी भविष्य के प्रति अनिश्चितता होने के कारण सूक्ष्म भय की लहरें उठ-उठकर जीवन को अशान्त करती रहती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं? (शेष भाग 7 पर)
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