तनाव से मुक्ति की ओर (Part : 8)

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(भाग 7 का बाकी)

जीवन में भय के दो मुख्य स्वरूप

भय के अनेक सूक्ष्म अवरोधकों को समझकर उसे हटा देने में ही मनुष्य की समझदारी है। अन्यथा व्यर्थ ही समय और शक्ति का अपव्यय होता है और व्यक्ति को जीवन के अन्त में पश्चाताप के आँसू बहाने पड़ते हैं। भय के सूक्ष्म स्वरूप को समझ लेने मात्र से भी जीवन बहुत अर्थें में भय-मुक्त हो जाता है। भय तो अनेक प्रकार के हैं परन्तु उदाहरण के लिए मौलिक रूप से भय के दो मुख्य स्वरूप की हम यहाँ व्याख्या करेंगे। मौलिक रूप से भय के दो रूप हैं () मृत्यु का भय और () कर्मों को हिसाब-किताब का भय।

मृत्यु का भय : प्राणी मात्र को जीवन से गहरा लगाव है। फिर मनुष्य का क्या कहना! इच्छाओं की तृप्ति से पूर्व यह जीवन हाथ से चला जाये - इसका भय अर्थात् मृत्यु का भय कहलाता है। मनुष्य यदि भोगवादी दृष्टि से मुक्त भी है, फिर भी उसे यह सूक्ष्म भय लगा ही रहता है कि अभी हमें जो करना चाहिये था वह मैंने कहाँ किया है?

जितना परमात्मा को याद करना चाहिए था, जितनी सेवा करनी चाहिए थी वह इच्छा भी पूरी नहीं हुई है, इसलिये भी व्यक्ति मृत्यु से भयभीत होता है। इसलिए भय-मुक्ती इसी में निहित है कि उन सभी आवश्यक कार्यों को स्थगित नहीं करके जल्दी-से-जल्दी और प्रतिदिन जितना पूरा करना है उसे पूरा कर देना चाहिए। कल के लिए यदि कुछ करने का बाकी नहीं रहा तो फिर कैसी चिन्ता, कैसा भय?

कर्मों का हिसाब-किताब अर्थात् दुःख का भय : आपने देखा होगा मानसिक या शारीरिक दुःख मनुष्य को कभी-कभी इतना तनाव ग्रस्त कर देता है कि वह यहाँ तक सोचने लगता है कि इससे तो मृत्यु अच्छी है। इसलिए शारीरिक वेदना का भय मृत्यु के भय से भी अधिक भयावह है। जिन्हें उच्चतम मानसिक स्थिति को प्राप्त करने के प्रति गहरी आत्मीयता एवं उत्कृष्ट अभिलाषा है उनके सामने कर्म-भोग दुविधाग्रस्त स्थिति पैदा कर देता है। धर्म, दर्शन एवं चिन्तन के क्षेत्र में कर्म-फल एक विवादास्पद प्रयन है। आत्मा की शक्ति महान् है या कर्म की शक्ति? कौन अपराजेय है? कुछ लोगों का मानना है कि कुछ भी करो, कर्म अति बलवान है जिसे बिना भोगे समाप्त नहीं किया जा सकता है भूत और वर्तमान में किये गये कर्मों के इस शक्तिशाली बन्धन से बिना भोगे कैसे मुक्त हुआ जाये इसे सोचकर दुर्बल चेतना का साधक भयभीत हो जाता है। फलत आत्मा की अनन्त अपराजित शक्ति के प्रति मनुष्य श्रद्धावान नहीं हो पाता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

भगवानुवाच : ``योग से विकर्में का खाता भस्म होता है'' योगबल या आत्मिक शक्ति से पहाड़ जैसे विघ्न राई और राई से रूई बन जाते हैं। कर्म-बन्धन शक्तिशाली ज़रूर है, परन्तु इतना नहीं कि आत्मा की तेजस्विनी ऊर्जा को सदाकाल के लिए बाँध सके। जैसे अज्ञान के कारण व्यक्ति कर्मों से बंधता है वैसे ही तपस्या और सद् ज्ञान के द्वारा व्यक्ति उससे मुक्त भी हो सकता है। ज़रूरत है शक्तिशाली योग की, जो कर्मबन्धन को भस्म कर सके। इसमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा तो द्रष्टा के झरोखे से शारीरिक व्याधियों को लीला की तरह देखती रहती है। इस संसार में सच्चे अर्थों में वही निर्भय है जिसने अन्दर से शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली है।

भय के अन्य रूप

वास्तव के आज हम इतने भयभीत भी इसलिए है कि वस्तुओं और व्यक्तियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं जो अनिश्चितता और संघर्ष से भरा है। यह आत्मा की वास्तविक शक्ति नहीं है। जैसे ही हमें आत्मा की शक्ति का अनुभव होने लगता है वैसे ही एक तरफ अनेक प्रकार के भय समाप्त होने लगते हैं तो दूसरी तरफ अन्य भौतिक शक्तियों पर पकड़ बनाने की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है।

जैसे ही कोई वस्तु परक दृष्टिकोण में उलझ जाता है। सभी कुछ उस पर अपना प्रभाव डालना प्रारम्भ कर देता है। ऐसी अवस्था में वे हमेशा दूसरे लोगों के मन्तक्रियों की अपेक्षा करने लगते हैं और उसके संकल्प, कार्य, भाव और लोकाचार उसके जीवन में प्रतिक्रियात्मक प्रभाव उत्पन्न करते लगते हैं। इसलिए अनेक आशंका, कुशंका और अनिश्चिंतताओं से आविष्ट जीवन सदा भय ओर तनाव से भरा रहता है।

जब आप भौतिक सम्पन्नता पर ध्यान देते हैं तो आपके जीवन का केन्द्र आपका स्वाभिमान होता है। यह स्वाभिमान आपके खुद द्वारा निर्मित वह आकृति है जो अभिनय के लिए सामाजिक स्वीकृति और मान्यता की मोहताज है। इस मुखौटे को कायम रखने के लिए अनेक प्रकार की शक्तियाँ, जैसे धन की जन की इत्यादि पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए संघर्षशील बने रहना पड़ता है जो मात्र भय पर आधारित है कि कहीं यह मुखौटा खुल ना जाये। जबकि हमारा मूल स्वभाव और स्वरूप शान्ति, आनन्द, प्रकाश, प्रेम और निर्भय स्वरूप है जो निन्दा-स्तुति मान-अपमान और किसी भी चेतावनी से भयमुक्त है। जो अपने स्वमान में दिव्यगुणों से सम्पन्न सदा विशिष्ट, शालीन और अहंकार मुक्त है। झूठे स्वाभिमान और मुखौटे पर आधारित यह शक्ति इसलिए भी क्षुद्र है कि इसके आधार समाप्त होते ही यह शक्ति समाप्त हो जाती है। धन, पद, प्रतिष्ठा इसी तरह के मुखौटे वाली शक्ति है।

दूसरी तरफ आत्मा की शक्ति अविनाशी और अनन्त है। यह शक्ति आपके स्वयं के प्रयास द्वारा प्राप्त शक्ति है। वास्तव में आप आत्मा ज्ञान और शक्ति स्वरूप है। मात्र इसका स्मरण होना आवश्यक हो। आपक समस्त प्रयत्न, समस्त पुरुषार्थ, ध्यान, योग, धारणा इसी दिशा में उठाया गया कदम है।

आपको अपनी याद जाये और जो आप अपने ही द्वारा निर्मित अनेक मुखौटे के अन्दर छिप गये हैं उससे बाहर जाएँ। इस शक्ति की अपनी कुछ खास विशेषता है। यह शक्ति उस वस्तु या उस व्यक्ति को अपनी और स्वत ही आकर्षित कर लेती है जिसे आप पाना चाहते हैं।

विराट ब्रह्माण्ड में चेतन, वस्तु, स्थितियों और परिस्थितियों में ऐसा चुम्बकीय आकर्षण प्रारम्भ कर देती है कि अनेक संयोग और निमित्तों का अद्भुत सामंजस्य से वह इच्छित फल आपके सामने अपने आप प्रगट हो जाता है।

इसी सिद्धान्त को प्रकृति, पुरुष और परमात्मा के मध्य प्रेम पूर्ण सामंजस्य और न्यायशील सहयोग का प्रसाद कहते हैं। इस स्थिति से आपके व्यक्तित्व में ऐसा प्रेमपूर्ण आकर्षण पैदा हो जाता है कि लोग सहज ही आपके प्रेमपूर्ण सम्बन्ध में आकर आपकी इच्छा को पूरा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं।

1. कहीं मैं असफल तो नहीं हो जाऊंगा?

2. कहीं मैं किसी रोग से आवन्त तो नहीं हो जाऊंगा?

3. कहीं मैं निर्धन तो नहीं जाऊंगा?

4. भय पैदा होने का कारण है इस बात का अज्ञान कि हमारे पास असीम सामर्थ्य है।

5. आशंका, वहम तथा अन्ध विश्वास के विचार के कारण भी लोग भयभीत रहते हैं जैसे कोई सोचता है कि 13 नवम्बर मेरे लिए अशुभ है। कहीं बिल्ली रास्ता काट दें।

6. लम्बे समय से कष्ट और पीड़ा झेलने के बावजूद भी लोग सोचकर इसलिए अपना ऑपरेशन नहीं कराते हैं कि कहीं मैं मर जाऊँ।

7. कहीं मेरी दुर्घटना हो जाये इसलिए मैं स्कूटर पर नहीं चढ़ता हूँ।

8. भय और आशंका से उत्पन्न नकारात्मक भाव और विचार जैसे उदासी, निराशा, हतोत्साहित होना इत्यादि पैदा होते हैं।

9. कल क्या होगा इस चिन्ता से भय।

10. संशय और उहापोह की स्थिति मनुष्य को चिन्तित और भयभीत कर देती है।

11. विशेषाधिकार छिन जाने का भय।

12.  इज्जत प्रतिष्ठा जाने का भय।

(शेष भाग 9 पर)

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें

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