तनाव से मुक्ति की ओर (Part : 9)

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(भाग 8 का बाकी)

भय-मुक्ति का मार्ग –– राजयोग

जिसका साथी है सर्वशक्तिवान, उसे विसि बात का भय! और साथी से हमें सदा शक्ति प्राप्त होती रहे इसकी विधि है प्रभु -प्रेम। भय का भूत तो कमज़ोरी और अज्ञान के अन्धकार में पैदा होता है। जब सर्वशक्तियाँ उपलब्ध हैं फिर भय किस चीज़ का! इसलिए भय-मुक्ति के लिए हमारा अत्यधिक बल राजयोग का अभ्यास करने पर है। भय-मुक्ति की सबसे बड़ी औषधि है अशरीरी अवस्था का अनुभव। राजयोग का अर्थ ही है आत्मा के निजी स्वभाव पर पड़े अंधकार के आवरण को हटा देना। फिर कोई तनाव, कोई भय, अपेक्षा। शान्ति ही शान्ति, सुख ही सुख। सभी चिन्ताओं से मुक्त आपक अन्तर्मन में सदा चैन की बंशी बजती रहेगी।

वास्तव में `स्व' का मूल स्वभाव, भयमुक्त, सभी आन्तरिक बन्धनों से परे किसी भी प्रकार की धमकियों से मुक्त और निन्दा से पार, आनन्द, प्रेम, शान्ति, विस्मय-विमुग्ध और चमत्कारिक रोमांच से भरपूर है। भौतिक जगत के सभी पदार्थों से लेकर भाव के अन्तर जगत तक के समस्त लगाव कहीं--कहीं आपके आन्तरिक सम्बन्धों की प्रतिमूर्ति है। उदाहरण ö मान लीजिए आपको धन प्राप्त करने के प्रति असफलता का भय या किसी भी प्रकार का अपराध बोध है तो कहीं--कहीं आपकी चेतना में प्रेम के अभाव के कारण असुरक्षा का भय है।

और इस कष्टकारी भय से मुक्ति का उपाय, बाह्य धन, पद, प्रतिष्ठा नहीं हो सकता है। इससे मुक्ति का एक मात्र उपाय हो सकता है –– आपके अपने वास्तविक `स्व' की अर्थात् आत्मा की अनुभूति। यही अनुभूति सभी प्रकार की सफलता का राजमार्ग है। इस बात के अनुभव से फिर किसी भी प्रकार के चाहत की व्याकुलता, भय, धन-सम्पत्ति का अभाव आपको व्याप्त नहीं करेगा। क्योंकि तब आप यह जान लेंगे कि आप प्रकृति के मालिक हैं। समस्त प्राप्तियों का मूलाधार आपके स्वयं की शक्ति ही है। प्रकृति और पुरुष अर्थात् आत्मा और परात्मा जगत नाटक में इन शक्तियों के बीच अद्भुत तालमेल स्थापित करता है।

आत्मा और शरीर का भेद-ज्ञान एवं अनुभव-भय-मुक्ति का आधार

मैं के शुभ अर्थात् स्वमान का चिन्तन और `मैं' के अशुभ अर्थात् अहम का विसर्जन ही हमें भयमुक्त बनाकर निर्भयता की स्थिति को प्राप्त करा सकता है। भय-मुक्ति के लिए एक ही श्रेष्ठ मार्ग अशरीरी अवस्था का अभ्यास और अनुभव। आत्मानुभव या अशरीरी स्थिति का अर्थ है –– जो चैतन्य के साथ अभिन्नता स्थापित किये हुए है उस अभिन्नता के सम्बन्ध को तोड़ देना।

चिरकाल से चले रहे आत्मा और शरीर के बीच स्थापित अद्वैत के सम्बन्ध को तोड़ना! जैसे-जैसे यह अभ्यास साधता है, वैसे-वैसे मनुष्य की अन्तर्दृष्टि विकसित होती चली जाती है। आत्मा और शरीर का भेद-ज्ञान, विवेक का जागरण और संयम की उर्वरक मनोभूमि सहज ही तैयार होती चली जाती है, फिर अध्यात्म के नये आयाम खुलते चले जाते हैं जिसमें पहला है, निर्भयता या अभय की स्थिति। जिसका देह-अभिमान टूट गया उसे दुनिया में कोई भी भयभीत नहीं कर सकता।

इस प्रकार राजयोग द्वारा मनुष्य आत्मा के अद्वितीय आलोक-शिखा से परिचय प्राप्त कर लेता है। जो देह से नर और नारी के भेद से मुक्त अन्दर में आत्मनिष्ठ हो, आध्यात्मिक जीवन के विकास हेतु मंगलकारी कार्य करते हुए अपनी दिव्य किरणें विकीर्ण करता रहता है। राजयोग का अर्थ है अपने अन्तकरण में भय और मृत्यु के आवेग पर विजय प्राप्त कर सहज आनन्द का अमृतद्वार उपलब्ध करना। तब ही मानव वर्तमान और भविष्य में व्यर्थ के तर्क और अनात्मवादी भोग परायणता की वृत्ति को पराभूत कर आत्मा की महान् मंगलमयी शक्ति को जागृत कर स्वयं और विश्व में भय की कटुता को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

भय से नुकसान : भय से हमारी कार्य कुशलता नष्ट हो जाती है। भय के कारण चैन की नींद खो जाती है। भय हमारी इच्छा आकांक्षा के संकल्प के लिए अनिष्टकारी है। भय के कारण मृत्यु तक हो जाती है। भय सभी रोगों की जड़ है।

अनेक तरह की आशंका, कुशंका और चिन्ता के विचार मनुष्य को भय से कम्पित करते रहते हैं। भय के कारण अनेक तरह की शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का ह्रास होता रहता है जिसके कारण किसी भी दिशा में अपेक्षित आन्तरिक शक्तियों के अभाव के कारण सफलता सम्भव नहीं हो पाती है और जीवन पर दुःख, अशान्ति, निराशा और उदासी रूपी प्रेत हम से चिपके रहते हैं। भय उत्पन्न करने के लिए शंकाकुशंक रूपी विचार क्या है?

यदि कोई यह दृढ़ संकल्प करता है कि मैं इस कार्य को कर सकता हूँ, चाहे मुझे इसके लिए कितना ही कष्ट क्यों सहन करना पड़े, वह अवश्य ही अपने उस लक्ष्य को पाने में सफल हो जाता है। इसके विपरीत जो अनेक शंका, कुशंका और संदेह के अनिश्चयपूर्ण विचारों की आँधी से घिरा रहता है वह भयभीत हो अपने साहस को खोकर लक्ष्य से भटक कर असफल हो जाता है। इसलिए पुरुषार्थी को चाहिए कि वह प्रणपूर्वक संकल्प और कार्य करे।

विजयी मनोवृत्ति वाला कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना क्योंकि वह अपने रचनात्मक कार्य के प्रति दृढ़ निष्ठा तथा प्रबल आत्म-विश्वास से भरा होता है वह ढुल-मुल प्रवृत्ति से दूर सदा अपने विजय के प्रति आशान्वित रहता है। भय, असफलता, दुःख और चिन्ता के निषेधात्मक विषमय विचारों को अपने आसपास फटकने भी नहीं देता है। उन्हें पता होता है कि भय पूर्ण विचार मनुष्य की मानसिक शक्तियों को निष्क्रिय और पंगु बना देते हैं इसलिए मनुष्य को चाहिए कि ऐसी मूर्खतापूर्ण आशंकाओं को त्याग कर सदा निर्भय बनें।

मृत्यु तो एक बार अवश्यम्भावी है। फिर भयभीत होकर मनुष्य बार-बार क्यों मरता है क्या इसे समझदारी कहा जायेगी?

(शेष भाग 10 पर)

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