(भाग 9 का बाकी)
तनाव मुक्ति के सुनहरे सिद्धान्त
1. वर्तुलाकार जीवन में चारों तरफ के घटना क्रम को साक्षी होकर देखने से आप पायेंगे कि जीवन में इसके कई लाभ हैं, चाहे वह लाभ प्रत्यक्ष रूप से हो या अप्रत्यक्ष रूप से परन्तु, सदा उसके शुभ पहलू को ही देखें।
2. न तो अतीत में की गई गलतियों के लिए ग्लानी से भरें और न ही भविष्य की आशंकाओं से चिन्तित हों क्योंकि प्रथम तो राख है और दूसरा वह भी नहीं। आज का यह पल आपके हाथ में है। यही और अभी जीवन की शुद्धता है। इसे पूरी तरह जिन्दादिली से जिया जाये। अपनी कर्म-शक्ति को श्रेष्ठ सृजन में अभी से लगा दीजिए। भविष्य तो आपके श्रेष्ठ कर्मों का शुभ प्रभात है।
3. इस संसार में आप अद्वितीय और अतुलनीय है। इस संसार में परमात्मा कोई भी कार्बन कापी बनाता ही नहीं। इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना व्यर्थ है। प्रत्येक व्यक्ति अति विशिष्ट है। जगत में भिन्नता अनिवार्य शर्त है। श्रेष्ठता उसमें अन्तर्निहित सम्भावनाएँ। इसलिए व्यर्थ में अपनी तुलना दूसरे से करके चिन्तित मत होईये।
4. निंदा वह कसौटी है जो सदैव आपकी चरित्र की शुद्धता की जाँच करता रहता है कि आप धैर्य, क्षमा, प्रेम और सहनशीलता आदि आन्तरिक दिव्यताओं पर कितना खरा उतरते हैं इसलिए निन्दक को अपना नज़दीकी मित्र समझें जो आपकी आन्तरिक स्थिति के सामने दर्पण की तरह है। यदि आपकी छवि में कहीं कोई कमी है तो चुपचाप सुधार कर लीजिए और यदि छवि परिपूर्ण है फिर निश्चित हो जाइए। प्रसन्नता और धन्यवाद दोनों ही स्थितियों में है फिर तनाव कैसा।
5. प्रेम, सहानुभूति और क्षमाभाव, मानवीय भावों में सब से महान् और उदात्त है। दूसरे द्वारा अपनी स्वयं के प्रति की गई गलतियों और पीड़ा पहुँचाने के बदले उसे क्षमा कर देना आन्तरिक गरिमा और प्रसन्नता का अनुभव करने का अद्भुत स्वर्णिम सूत्र है। इसे एक बार करके देखें आपको इसे बार-बार करने का मन होगा। सदा याद रखें दूसरों को क्षमा दान देने से उपयुक्त समय पर आप को भी क्षमादान मिल ही जायेगा।
6. कहावत है –– ``एक हि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय'' अर्थात् जो समस्या सब से आवश्यक है उसे उसी क्रम सुलझाने में अपनी शक्ति लगाएँ, तो धीरे-धीरे आप उसे अंतिम क्रम तक सहज ही सुलझा सकेंगे। अभिमन्यु नहीं बने कि समस्याओं के चक्रव्यू में फंसता पड़ जाये।
7. संसार में ऐसे बहुत से चिन्ताग्रस्त लोग हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में आपके सहयोग की ज़रूरत है। आप अपनी छोटी सी चिन्ता की गठरी लेकर अपना रोना छोड़ दीजिए। यदि सर्वोदय की भावना से सबके सहयोग में जुट जायें तो एक तरफ आप अपनी चिन्ता को सहज ही भूल जायेंगे तो दूसरी तरफ आप दूसरों को सहयोग भी दे पायेंगे। कैसे होगा करके खुद देख लीजिए।
8. कहते है,
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। यदि आप समस्या के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखेंगे तो समस्या समाधान स्वरूप दिखाई देगी और आप कष्टकारक परिस्थिति में भी सुखमय स्थिति का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत भी सही है। तनाव मुक्ति के लिए पहली स्थिति बेहतर है।
9. कुछ स्थितियाँ अत्यन्त विषम होती है, जिसे हम प्रयत्न द्वारा नहीं बदल सकते हैं। वहाँ इस सिद्धान्त को दृढ़ता से स्मृति में धारण करके रखना चाहिए कि परिवर्तन जगत का शाश्वत नियम है। बस धैर्य और प्रतीक्षा की ज़रूरत है। सब अपने आप बदल जायेगा। कहावत है ö समय सबसे बड़ा मरहम है, जो सभी घावों को भर देता है।
10.
सृष्टि एक विशाल रंग मंच है जहाँ सभी अभिनयकर्त्ता समयानुसार अपना-अपना अभिनय (चाहे वह नायक का हो या खलनायक का) कर पुन यविनिका की पृष्ठ भूमि में चले जाते है। यदि हम इस नाटक के द्रष्टा या साक्षी बनकर अपना अभिनय करें तो यह प्रश्न ही कहाँ उठता है कि इसका पार्ट गलत है अर्थात् इसकी गलती है...
फिर तनाव का प्रश्न ही कहाँ उठता है।
11.
बदले की विषमय भावना से कितना नुकसान समस्त मानव जाति का हुआ है, इस बात का इतिहास साक्षी है। परिस्थिति या व्यक्ति को बदलना बड़ा ही कठिन है। फिर क्यों न हम अपने आप को बदल लें। क्योंकि अपने को बदलना तो हमारे हाथ में होता है। जहाँ बदला लेने का भाव तनाव में अभिवृद्धि करता है वहाँ स्वयं को बदलने का उद्देश्य जीवन में सफलता की ऊँचाई का आरोहण है।
12.
ईर्ष्या पतन ही जड़ है और ईश्वरीय चिन्तन उन्नति की सीढ़ी। ईर्ष्या दिल को जलाकर राख कर देती है और ईश्वरीय चिन्तन, शीतलता की असीम तृप्ति का अहसास कराती है,
इसलिए सदा ईर्ष्या से बचे।
13.
जगत का एक अनादि नियम है जो हम देते हैं वही अनन्त गुणा होकर हमें मिलता है। फिर मुक्त हस्तों द्वारा खुशी को क्यों न बाँटे, ताकि हमारे जीवन में खुशियों का खज़ाना भरपूर हो। भूलकर भी दुःख देने के भाव,
विचार और प्रयत्न को कभी भी नहीं होने दें।
14.
जब भी कोई रोग-शोक या अन्य कष्ट कारक परिस्थिति आपके सामने उपस्थित हों, तो उसे खुशी-खुशी यह सोचते हुए स्वीकार कर लेना चाहिए कि यह खुद के द्वारा भूतकाल में बोये गये किन्हीं विषमय कर्मों के बीज का फल है। बस यह हिसाब चुक्त हुआ कि हुआ।
15.
अनेक प्रकार के ``मैं पन'' रूपी अहंकार को मन से निकाल देने से भ्रम रूपी अंधकार अपने आप मिट जाता है। आज अहंकार की बहुत बड़ी समस्या मानवता के सुख-शान्ति में बाधा डाले खड़ी है। स्वयं के सज्ञान की मशाल जलाकर इस अंधकार के अवरोध को समाप्त करते ही सभी तनाव अपने आप टूटकर बिखरते चले जायेंगे।
16.
दिन में जितनी बार हो सके योग के माध्यम से अपने विचारों को कम और सकारात्मक बनाने का अभ्यास अवश्य करें।
17.
अपनी चिन्ता की गठरी सच्चे मन से प्रभु को अर्पित कर हल्के बन जाये।
18.
अपने सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए चाहे वह भौतिक या आध्यात्मिक हो, प्रभु का चिन्तन अर्थात् ईश्वर से योग अवश्य लगायें। ताकि आपके अन्दर प्रबल आन्तरिक शक्ति पैदा हो जो आपके जीवन से तनाव को मिटाने में मददगार साबित हो तथा दूसरों को भी कुछ देने में सहयोग प्रदान करें।
(समाप्त)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें
आपका और आपके परिवार का तहे दिल से यहाँ स्वागत है।


