उद्देश्य –– अनन्त की उड़ान (PART : 4)

0

 


(भाग 3 का बाकी)...

लक्ष्य निर्धारण के नियम

प्राय लक्ष्य का निर्धारण करने में कई लोग अपने को असहाय महसूस करते हैं। जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत हो जाने के बाद भी वे यही कहते पाये जाते हैं कि पता नहीं वे इस जग में क्यों आये हैं? परन्तु इस संदर्भ में ऐसे लोगों को कुछ उपाय सुझाएँ जा सकते हैं जो उनके लक्ष्य निर्धारण में कसौटी का कार्य कर सकें।

उद्देश्य निर्धारण में यह बात अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि आपका आकर्षण या लगाव किस विषय से है। क्योंकि अरुचिकर विषय के चुनाव से आप व्यर्थ ही अपनी शक्तियों का व्यय करेंगे। जो कार्य स्वाभाविक रूप से आपको अच्छा नहीं लगता उसे करने में निश्चय ही आपकी पूर्ण शक्तियाँ नियोजित नहीं होंगी और उसका परिणाम होगा असफलता।

व्यंग्य : एक व्यक्ति ने पाँचवी क्लास के एक लड़क से पूछा -- ``बेटा पढ़-लिखकर तुम क्या बनना चाहोगे'', लड़के ने जवाब दिया -- ``क्या बताँऊ, मम्मी कहती है बेटा, पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना है, पापा कहते हैं पढ़-लिखकर कम्प्यूटर इंजीनियर बनना है और मास्टर जी क्लास में मुर्गा बना देते हैं। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता है कि मुझे क्या बनना है''। उस व्यक्ति ने कहा -- ``बेटा इसी कारण आज तक मैं भी कुछ नहीं बन सका''

उद्देश्य का निर्धारण इस बात को ध्यान में रखकर करना चाहिए कि आपकी स्वाभाविक अभिरुचि या झुकाव किस बात में है? जिसके कारण आप अपनी प्राकृतिक शक्तियों को उस विषय में लगा सकें। उदाहरण -- यदि आपकी अभिरुचि संगीत में है और आप विज्ञान में अपना दिमाग खपा रहे हैं तो वही कहावत चरितार्थ होगी कि `धोबी का कुत्ता न घर का, न घाट का'

उद्देश्य निर्धारण की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कसौटी होगी नैतिक मूल्य और मानव कल्याण

प्रत्येक मनुष्य को अपने लक्ष्य निर्धारण में यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि उनके उद्देश्य की पूर्ति से किसी को कष्ट या अहित तो नहीं होता है। उसके निर्धारण से किसी सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय हित या आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की अवहेलना तो नहीं होती है। यदि आपके उद्देश्य की पूर्ति में इन नियमों के उल्लंघन होने की सम्भावना है तो, उस लक्ष्य को आपको अवश्य ही छोड़ देना चाहिए।

वे सभी उद्देश्य त्याज्य और निन्दनीय है जिससे आप स्वयं तो लाभान्वित होते हों, परन्तु दूसरे को इससे हानि उठानी होती हो। दुष्ट भाव, विचार और आचरण में लिपटा उद्देश्य मनुष्य को लम्पट और दुराचारी बना पतन के गर्भ में गिरा देता है।

यदि आप धन पाने का लक्ष्य बनाते हैं तो यह बुरा नहीं है। क्योंकि धन हमें स्वास्थ्य देता है गरीबी मिटाता है, पारिवारिक दायित्व को निभाने में मदद करता है इत्यादि धन के अनेक फायदे हैं, परन्तु यदि आप इस लक्ष्य को पूरा करना चाहते हैं तो ज़रा सोचिए! क्या यह उचित है कि इसे आप निम्नलिखित तरीके से पूरा करें --

1. हेरोइन, अफीम, चरस, ब्राउन शुगर को बेचकर?

2. चोरी, भष्टाचार, घूस, घोटाले और जुआ इत्यादि द्वारा?

3. क्या इससे किसी को मानसिक सुख, शान्ति और चैन मिलेगा?

4. क्या समाज या सरकार ऐसे लोगों को स्वीकार करेंगे? नहीं, ना।

अंतिम लक्ष्य बना देता है, पतित साधनों को भी पावन।

यह सिद्धान्त निपट मिथ्या है, न ले सहारा इसका जन-जन।।

जो साधन नर के शोणित से, लथ-पथ वे कब है श्रेयस्कर।

आओ जन-जन आज त्याग दें, यह सिद्धान्त कुरूप घृणाकर।।

-- बालकृष्ण शर्मा `नवीन'

सुख, समृद्ध की और यश की कामना बुरी नहीं है, परन्तु यदि आपका उद्देश्य मानवता के उत्थान से पोषित हो तो, उसे अवश्य प्राप्त कीजिए। फिर भी महान् और दिव्य जीवन का उद्देश्य और सभी तरह के उद्देश्यों से ऊँचा है। हमें एक ऐसे उद्देश्य का चुनाव करना चाहिए जो लोक पसन्द, मन पसन्द और प्रभु पसन्द हो।

(शेष भाग 5 पर)

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें। आपका और आपके परिवार का तहे दिल से स्वागत है।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top