(भाग 2 का बाकि)
उद्देश्य
निर्धारण में विचारों का धुवीकरण
एक लोहे
की पट्टी और एक लौह चुम्बक में क्या अन्तर है? इतना ही अंतर है कि एक का प्रत्येक अणु
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के बीच एक व्यवस्था-क्रम में व्यवस्थित
है -- इसलिए वह चुम्बक है। दूसरा इसलिए चुम्बक नहीं है कि उसका
उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव अव्यवस्थित है। यही आन्तरिक अव्यवस्था उसकी शक्तियों
को समाप्त प्राय कर देती है।
इस तरह
उसका चुम्बकीय प्रभाव नष्टप्राय हो जाता है। इस प्रकार बहुत से लोगों का जीवन र्निउद्देश्य
होने के कारण उनकी भावना-शक्ति, विचार-शक्ति, इच्छा-शक्ति और कर्म की शक्ति बिना पतवार की नाव की तरह
जीवन सागर में कभी इस इच्छा की लहर तो कभी
उस इच्छा की लहर, कभी उस विचार की तरंग
तो कभी इस विचार की तरंगो पर थपेडे खाती हुई अपनी आन्तरिक शक्तियों को नष्ट कर भटकती
रहती हैं।
यदि ऐसे
लोगों से यह पूछा जाये कि आप अपने जीवन में क्या पाना चाहते हैं तो उनका सपाट-सा उत्तर होता
है कि उन्हें ठीक-ठीक पता नहीं है कि उन्हें क्या पाना है। आप
ही बताइये वह नाव किस किनारे पर लगेगी। एक कहावत है, जो नाविक
अपनी यात्रा के अंतिम बन्दरगाह को नहीं जानता है, उनके अनुकूल
हवा कभी नहीं बहती है। गंतव्य को बिना जाने कोई भी व्यक्ति हवाई जहाज, ट्रेन या बस में कभी नहीं बैठता है कि उसे किस जगह पर उतरना है।
कहते हैं
-- गाँव का एक अंजान बुद्धू-सा आदमी प्रथम बार ट्रेन से
यात्रा कर रहा था। जब टिकट चेकर (टी.टी.)
ने उससे टिकट माँगा तो उस व्यक्ति ने टिकट बहुत ढूँढ़ा, परन्तु उसे टिकट नहीं मिला। शायद कही खो गया होगा। अब तो वह व्यक्ति घबराया
और रोने लगा।
टी.टी. को उस पर दया आ गई। उसने उस गरीब व्यक्ति को कहा, ``अच्छा
कोई बात नहीं, रोना बन्द करो''। परन्तु
आश्चर्य वह फिर भी रोते जा रहा था। आसपास के लोगों ने उससे पूछा कि अब क्यों रो रहे
हो।
पता है
उस गवांर ने क्या जवाब दिया? वह इसलिए रो रहा था कि उसे यह पता नहीं है कि उसे
किस स्टेशन पर उतरना है क्योंकि उस स्टेशन का नाम तो उस टिकट में लिखा था और वह टिकट
तो खो चुका था।
ऐसे बहुत-से लोग बिना इस
बात को जाने बिना कि उन्हें कहाँ पहुँचना है, जीवन रूपी गाड़ी
में सवार हो जाते हैं। जीवन गति में तीव्रता भी है, परन्तु क्यों,
किस दिशा में और कहाँ समाप्त होगी उन्हें यह बिलकुल ही पता नहीं क्योंकि
उनका जीवन लक्ष्यविहीन है, उन्होंने अभी तक किसी लक्ष्य का निर्धारण
ही नहीं किया है।
इसलिए
महापुरुषों की तरह प्रत्येक मनुष्य को अपने किसी एक कार्य-क्षेत्र का चुनाव
कर लेना चाहिए जो उसे रुचिकर लगे। चाहे वह कला हो, आध्यात्म हो,
विज्ञान हो, साहित्य हो, उद्योग हो या और कुछ, परन्तु चुनाव की स्वतंत्रता मनुष्य
के खुद के उपर है। उन्हें उसमें प्रवीणता और सफलता के लिए अपनी समस्त
शारीरिक
और मानसिक शक्तियों का धुवीकरण कर लेना चाहिए। निर्णय का दृढ़ संकल्प करते ही अचेतन
की समस्त बिखरी हुई सुषुप्त शक्तियाँ ध्रुवीकृत होकर निर्धारित लक्ष्य की दिशा में
अपने आप प्रवाहित होने लगती है, जो आगे सफलता दिलाने में वरदान सिद्ध होती है।
लक्ष्य
निर्धारण में कल्पना का प्रथम स्थान है, परन्तु इच्छा व योजना, नियमित कार्य की प्रतिबद्धता, समय का निर्धारण और निश्चय
में दृढ़ता के बिना कल्पना-मात्र कपोल कल्पना बनकर रह जाती है।
उदाहरण
-- यदि आपको उपवास करने की इच्छा है, परन्तु वह लक्ष्य तब
बनेगा जब आप यह निश्चय करेंगे कि इसे मैं आज से 10 दिन तक करूंगा
और प्रतिदिन आप जब भोजन नहीं करेंगे तब यह सम्भव हो सकेगा।
लोग
लक्ष्य या उद्देश्यविहीन जीवन क्यों जीते हैं?
- क्योंकि उन्हें
इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि जीवन में उद्देश्य का क्या महत्त्व है? उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि उद्देश्य का निर्धारण कैसे किया जाता है?
- रास्ते की चुनौती को
स्वीकार करने की हिम्मत का अभाव।
- असुरक्षा की भावना।
- अगर या मगर का भय। परिस्थिति
की भयंकरता का अनुमान लगाना कि अगर ऐसा हुआ तो फिर क्या होगा। अगर-मगर (मगर मच्छ) का भय उनके मन में सदा ही बना रहना कि कहीं
सफलता नहीं मिली तो लोग उनका मजाक उड़ायेंगे।
- निम्न स्तर के विचार
और जीवन-प्रणाली के कारण ऊँची महत्त्वकांक्षा की कमी। ऐसे लोग निम्न स्तर के सामाजिक
और पारिवारिक परिवेश में जीते हैं।
- वे प्रेरणात्मक साहित्य, जिसमें इस बात
का उल्लेख रहता है कि किस प्रकार विपरीत परिस्थिति में भी लोगों ने अपने उद्देश्य को
प्राप्त किया, के अध्ययन की कमी, जिस कारण
सफलता के लिए अपेक्षित अनुशासन और आत्म-विश्वास का भाव जागृत
नहीं हो पाता।
(शेष भाग 4)
प्रजापिता
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में
सपरिवार
पधारें।


