उद्देश्य –– अनन्त की उड़ान (PART : 7)

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(भाग 6 का बाकी)

अभिरुचि से लक्ष्य और उद्देश्य प्रभावित होते हैं

लगन : वास्तव में कोई भी उद्देश्य या लक्ष्य लगन के द्वारा ही साकार होती है, न कि मात्र इच्छा करने से। जैसे ही आप अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करते हैं और उसके प्रति आकर्षित होते हैं, आपके मन की समस्त प्रसुप्त शक्तियाँ लक्ष्य की दिशा में प्रयत्नशील हो उठती हैं। विचार-शक्ति, कल्पना-शक्ति, स्मृति की शक्ति, निर्णय की और परखने की शक्ति, उद्देश्य के प्रति लगन होने के कारण आश्चर्यजनक ढंग से सुन्दर तालमेल के साथ अपने आप कार्य करने लगती हे।

लगन और एकाग्रता : एकाग्रता का अभ्यास दो बातों को दर्शाता है।

1. आपकी अभिरुचि उस विषय-वस्तु में नहीं है, परन्तु मज़बूरीवश आपको उस विषय से संलग्न रहना पड़ता है।

2. एकाग्रता से कार्य क्षमता में आश्चर्यजनक वृद्धि अवश्य होती है, परन्तु तब जब आपका लक्ष्य या वह विषय-वस्तु आपका मनभावन कार्य नहीं हो जाये। मन का एक नियम है। जो चीज़ उसे रुचिकर है या उसके लिए चित्ताकर्षक है वहाँ वह अपने आप ठहर जाता है। इसलिए यदि आप अपने को किसी लक्ष्य पर एकाग्रचित करना चाहते हैं तो आपके लक्ष्य का चुनाव रुचिकर या मनभावन अवश्य होना चाहिए।

लगन से स्मरण का भी गहरा सम्बन्ध है

प्राय लोग आप को यह कहते मिल जायेंगे कि कुछ-कुछ बातों को मैं भूल जाया करता हूँ। याद करना और भूल जाना यह मानव मन की योग्यता है। अनावश्यक और दुःखद स्मृति जीवन के लिए भार स्वरूप होती है, जो तनाव पैदा करती है। उसे भूल जाना अच्छा है, परन्तु आवश्यक बातें भूल जाना सफलता में बाधक है। मनोवैज्ञानिकों ने अनुंधान के बाद यह निष्कर्ष लिया है कि रुचिकर बातें इंसान कभी भी नहीं भूलता है। प्रसन्नता प्रदान करने वाली वे सभी बाते मनुष्य को सदा याद रहती है। मान लीजिए, आपका लक्ष्य है कम्प्यूटर इंजिनीयर बनने का तो उस विषय सम्बन्धी जानकारी से आपका अनुराग स्वाभाविक ही होगा। इसलिए उसे पढ़ना और याद रखना आपके लिए बड़ा ही आसान होगा, परन्तु यदि किसी कारण से आपको अर्थशास्त्र पढ़ना पड़े तो निश्चित ही उस जानकारी की स्मृति धुंधली और अप्रभावी होगी। विस्मरण का सीधा सा अर्थ हुआ उस विषय के प्रति अनुराग या रुचि की कमी।

नूतन विचारों के सृजन में लगन का स्थान

उद्देश्य के प्रति लगन वह खाद है, जो नूतन विचारों को बहुतायतता से पैदा कर प्रयत्न शक्ति को तीव्र कर देता है। जितनी भी मौलिक रचनाएं हुई हैं या जितने भी अविष्कार हुए हैं उसकी पृष्ठ-भूमि में हमेशा नवीन विचार ही रहे है, जो आन्तरिक लगन से पैदा हुए हैं। चिन्तन, मनन, अध्ययन और ध्यान द्वारा जब आप विचार सागर मंथन करते हैं तो नूतन विचार नवनीत की तरह बाहर प्रगट हो जाते हैं। मन का ध्रुवीकरण होने के कारण उसमें एक चुम्बकीय बल पैदा हो जाता है। उद्देश्य के अनुसार नये विचार को प्रकट करने का जो आधार है या मंथन करने वाला जो यंत्र है वह है लगन या शौक। आप जितना लगन में मगन रहेंगे उतना ही विचारों में संख्यात्मक और गुणात्मक वृद्धि होती चली जायेगी। जैसे ही लगन की आग मंद होने लगेगी विचारों का प्रकटीकरण कम होता चला जायेगा। उद्देश्य के प्रति मन की रुचि की क्रियाशीलता नूतन विचार के सृजन का आधार है।

लगन से दृढ़ इच्छा-शक्ति का विकास होता है

मन के लिए लगन हो एक, मगन रहे बस रक्खे टेक।

इतने से ही तुम कृत-कृत, करती रहे नियति निजनृत्य।

मन को एक केद्र मिल जाए, तो इद्रासन भी हिल जाए।

इतना करो किसी भी तौर, स्वयं करा लेगा मन और।

भाई इसे न जाओ भूल, मन ही बन्ध मोक्ष का मूल।

-- मैथिली शरण गुप्त हिन्दू, पृष्ठ-163-164

उद्देश्य के प्रति आकर्षण होने से मनुष्य में सहज ही उसे पाने के लिए इच्छा-शक्ति प्रगट हो जाती है और इच्छा-शक्ति के साथ मनुष्य दिन-रात कठोर श्रम करने को भी तैयार हो जाता है। उसे किसी भी कठिनाईयों से संघर्ष करने और उस पर विजय प्राप्त करने में थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं होती है।

जिस प्रकार एक प्रेम पूर्ण व्यवहार, पाषाण हृदय को भी पिघला कर द्रवित कर देता है उसी प्रकार एक मनभावन उद्देश्य साधारण जीवन को महान् जीवन में बदल देता है। यह चारित्रिक दोष रूपी कीटाणुओं को निकालने की आन्तरिक गुप्त शल्य क्रिया है, जो बाद में निर्मल, दिव्य और स्वस्थ चरित्र का निर्माण भी अपने आप कर देता है। जीवन में सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् की सुवास उठे इसके लिए शुभ और मंगलमय जीवन के उद्देश्य का निर्धारण अवश्य ही करें।

उद्देश्य निर्धारण में दृढ़ता का अभाव

प्राय दुनिया में ऐसे लोग आपको मिल ही जायेंगे जिनके अन्दर अनेक तरह की योग्यता और प्रतिभा होती है। फिर भी वे समाज में सफल व्यक्ति नहीं कहलाते हैं। कारण है वे अपनी योग्यता को, अपनी प्रतिभा को एक निर्धारित लक्ष्य और उद्देश्य के प्रति दृढ़ता से प्रयोग नहीं करते। उस बिन्दू पर अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग नहीं करते, और दिशाविहीन, व्यर्थ ही अपनी शक्ति को नष्ट प्राय कर देते हैं। जीवन में लक्ष्य बन्दूक की वह नली है। जिसके पीछे प्रयत्न का तोला भर बारूद ही मनुष्य को गोली की तरह लक्ष्य तक पहुँचा देता है।

एक ही साधे सब सधे, सब साधे सब जाय

एक कहावत है `ज्ञान तो सभी विषयों का है, परन्तु दक्षता किसी एक विषय में भी हासिल नहीं है'। आज के इस युग में प्रतिभा और योग्यता के साथ किसी एक विषय में विशिष्टता का भी होना आवश्यक है। किसी एक विषय में विशेषज्ञ होने से ही व्यक्ति को समाज में उसकी उपयोगिता और एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता है। उस एक विषय में वह इतना विशिष्ट हो जितना उस जगह पर अन्य और कोई नहीं। इसके लिए मनुष्य को एक अटल और निश्चित ध्येय को चुन लेना चाहिए। फिर उसे कभी भी बदलना नहीं चाहिए। कई लोग अपने लक्ष्य पर स्थिर नहीं रहते हैं। दूसरे अन्य लोगों को सफल होते देख अपना लक्ष्य बदलते रहते हैं। जिसका परिणाम होता है समय, धन और प्रतिभा की बरबादी। युवकों को खास अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण निष्ठा और प्रतिबद्धता चाहिए। उन्हें यह अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि सभी प्रकार के लक्ष्य को प्राप्त करने में असुविधा और कठिनाइयाँ अवश्य आती हैं। इसलिए उन कठिनाईयों से थक कर हतोत्साहित होकर सफलता से पूर्व ही वापस नहीं लौट जाना चाहिए। कई बार तो ऐसा देखा गया है कि सफलता या मंज़िल उनसे चन्द कदमों के फासले पर थी, परन्तु हिम्मत हारकर वे वापस लौट गये।

पहली बार कैटलीना चैनल को पार करने वाली महिला ल्लोरेन्स चैडविक इसलिए प्रथम प्रयास में सफल नहीं हो सकीं क्योंकि वे घने कोहरे के कारण 400-500 मीटर दूर किनारे को वह नहीं देख पा रही थी। उसने कहा -- यदि मुझे किनारा दिख जाता तो मैं निश्चय ही लक्ष्य तक पहुँच जाती ओर दूसरे प्रयास में उसने इस हैरत अंजेग कारनामे को अंजाम दे दिया। इसलिए हमें एकाग्रचित और स्थिर बुद्धि होकर बिना इधर-उधर भटके ही अर्जुन दृष्टि से उद्देश्य पूर्ति में दक्षता हासिल करने का प्रयत्न करने रहना चाहिए। इस प्रकार जैसे ही एक व्यक्ति अपने कार्य में कुशल हो जाता है, उसकी समस्त आन्तरिक शक्ति बिना व्यर्थ नष्ट हुए महान् उद्देश्य को पाने में प्रयुक्त हो जाती हैं। उद्देश्य विहीन 50 तरह की योग्यता वाले मनुष्य से, एक प्रकार की योग्यता वाला मनुष्य अधिक सफल माना जाता है बशर्ते कि उसने लक्ष्य का निर्धारण दृढ़ता से किया हो।

(शेष भाग 8 पर)

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