(भाग 8 का बाकी)
अब हम क्वांटम देह भौतिकी को
देखें। सर्व प्रथम प्रकृति की जो अणुओं और परमाणुओं की भौलिक संरचना का स्तर है, क्वांटम का स्तर उससे भी सूक्ष्म हैं। पदार्थ या ऊर्जा की जो मौलिक इकाई होती
है। क्वांटम उन कणों से भी 10 से 10 लाख
गुण छोटा है, जिसे क्वांटा कहते है। जो इसके बनने का मूल स्त्रोत
है अदृश्य प्रकम्पन। इस स्तर पर ऊर्जा अत्यन्त लचीला तथा अंत परिवर्तनीय होता है। आध्यात्मक
इस अदृश्य तरंगों को ही भावना और विचार तरंग कहता है, जिसका मूल
उद्गम मन और आत्मा है। वास्तव में इस तरंग का मूल स्त्रोत मन और निराकर ज्योति बिन्दु
आत्मा ही है।
अति सूक्ष्म मन पर भी इसी अव्यक्त
आत्मशक्ति का प्रभुत्व है। विचार और भावना के रूप में ही यह सूक्ष्म और प्रचण्ड तरंग
सूक्ष्म शरीर का निर्माण करती है और सूक्ष्म शरीर के माध्यम से यह भौतिक शरीर के सबसे
सूक्ष्म भाग डी.एन.ए. तक
अपना प्रभाव उत्पन्न करती है। उसके बाद यह कोशिकाओं और क्रमस आगे बढ़ती हुई ग्लॉण्डस
और आगे के अंगों पर अपना प्रभाव उत्पन्न करती चली जाती है।
अदृश्य विचार और भावना तरंगों
वाला यह सूक्ष्म शरीर ही क्वांटम भौतिकी देह है। विचार भावनाएं प्रोटीन कोशिकाएं और
फिर अंग इस सबका जो दृश्य और अदृश्य भाग है उस सब का जो मूलाधार है यह क्वांटम देह
भौतिकी देह है। इसी क्वांटम स्तर पर उन समस्त संकेतों का संप्रेषण स्थूल काया में होता
रहता है।
सकारात्मक सोच-सुझाव द्वारा चिकित्सा का जो सर्व व्यापक महत्त्व है वह इसी प्रक्रिया के तहत
होता है। तो मूल हुआ आध्यात्मिक ज्ञान। क्योंकि आज इस बात की जागरुकता का होना आवश्यक
है कि हम दिखने वाली भौतिक देह मात्र नहीं हैं। आज की व्यथा कथा इसी सोच के कारण उत्पन्न
हुई है।
विचार पदार्थ में बदल जाता है
यह अवधारणा पहले तो लोगों में मान्य नहीं थी, परन्तु विज्ञान अब इस
अवधारणा को सिद्ध करता है।
स्पर्श माप घनत्व, श्रवण, और देखना इस माध्यम से पदार्थ का अहसास करना सम्भव
है, परन्तु फिर जो बिलकुल दृश्य नहीं है, अभौतिक है उसका अस्तित्व भौतिक स्तरों पर अमाप्य है। हाँ अभी-अभी एक तकनीक का विकास हुआ है जिसकी जानकारी अत्यंत सीमित है जिसका नाम है
-- पी.इ.टी.
(पोजीट्रान एमीशन टोमोग्रफी) जिसके माध्यम से इतना
सम्भव हो सका है कि किसी प्रबल विचार या भावना को उस समय उस मस्तिष्क में चल रहा हो
चित्र के रूप में खींच लिया जाए और उसे रेडियो अइसोटोप द्वारा जा ग्राफ बनता उसके विश्लेषण
के माध्यम से उस विचार को जाना जा सकता है परन्तु उसकी भी एक सीमा है। फिर भी विचारों
में अस्पष्ट भेद करना और शाब्दिक स्तर पर उसे जानना यह संभव नहीं है।
क्रोध, ईर्ष्या, घृणा इत्यादि को शाब्दिक स्तर पर व्याख्या करना
अभी भी सम्भव नहीं है क्वांटम देह भौतिकी या सूक्ष्म शरीर से आ रहे प्रकम्पनों को देखा
और जाना जा सकता है, परन्तु इसके लिए आपको सीखने की प्रक्रिया
से गुजरना पड़ेगा, जो बिल्कुल ही आपके व्यक्तिगत पुरुषार्थ पर
आधारित है। आपके संकल्प, आपकी भावनायें जो बिल्कुल अमूर्त और
अव्यक्त है वह मानसिक संवेग शरीर के तल पर कैसे चमत्कारिक ढंग से भौतिक पदार्थ या शारीरिक
रसायन में बदल जाते हैं इस को एक उदाहरण से देखें।
आप किसी सुनसान रास्ते से अंधेरे
में गुजर रहे हैं और कोई आतंकवादी अचानक पीछे से आपकी कनपटी पर पिस्तोल रख देता है
तो भय के वश आपका पूरा शरीर तक्षण काँप उठता है। पूरे शरीर में एक झटका सा लगता है
आप पसीने से तरबतर हो जाते हैं। शरीर की अंतस्त्रावि ग्रंथियों से जैसे एड्रिनल `एड्रिनलीन' का स्त्राव कर देता है जो बिलकुल पदार्थ है।
एड्रिनलीन उसका अंतिम अणु है क्वांटम देह या सूक्ष्म शरीर द्वारा जो संदेश सूक्ष्म
तरंगों के रूप में संप्रेषित होता है उसे आपके शरीर का सब से सूक्ष्म भाग डी.एन.ए. और उसके बाद कोशिकाएँ तुरन्त
उन आदेशों को ग्रहण करने और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया करने के लिए बाध्य होता है।
यहाँ हमें क्वांटम सिद्धाँत की
और अधिक व्याख्या नहीं करनी है मात्र यह स्पष्ट करना है कि अब हमें ज्ञान के प्रति
अध्यात्म के प्रति, आत्मा, मन,
बुद्धि, संस्कार और उसके द्वारा अव्यक्त भावों
और विचारों के प्रति जागरुक होना अत्यंत
आवश्यक है। जीवन की समृद्ध का राज अब मात्र भौतिक और आध्यात्मिक
विज्ञान के समन्वय वाली नई जीवन दृष्टि पैदा करने की कला या सीखने की कला में समाहित
है। अगर हम अपना जीवन उद्देश्य ऐसा बना सके तो अत्यंत शुभ है। लेखक का उद्देश्य निर्धारण
के प्रति ऐसी ही अवधारणा और जीवन दृष्टि है।
उद्देश्य : एक आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि
वास्तव में व्यवहारिक और उपयोगिता
के दृष्टिकोण से सुन्दर समउन्नत और समृद्ध विश्व-मानवता के लिए
उद्देश्य का निर्धारण आवश्यक है, परन्तु यदि गहन आध्यात्मिक जीवन
दृष्टि से देखा जाये तो जीवन का उद्देश्य जीवन है अर्थात् जीवन अपने आप में उद्देश्य
है। जीवन की समस्त दौड़, चाहे वह उद्देश्यपूर्ण हो या बिना उद्देश्य
के वह अपूर्णता या अभाव से पैदा होती है। संतुष्टता उस अभाव का पड़ाव है। यह पड़ाव
थोड़े क्षणों, घण्टों या दिनों का हो सकता है या फिर बचे हुए
पूरे जीवन काल तक।
जब हम अपने या `स्व' से परे हटकर जीवन में कुछ लाना चाहते हैं तो हम
एक लक्ष्य का निर्धारण करते हैं। वह लक्ष्य कुछ भी हो सकता है -- चाहे वह धन, पद, यश, प्रतिष्ठा, कुल या साहित्य हो। लेकिन जिस दिन किसी व्यक्ति
को `स्व' का बोध या हम उसे स्पिरीट या आत्मा
कहें, होता है उसके जीवन के सभी गहरे उद्देश्य खो जाते हैं। वह
प्रतिपल अपने होने में या वर्तमान में रहने लगता है। क्योंकि उसके समस्त तादात्म्य
(असोशिएशन) टूट जाते हैं। देह, नाम, उपाधियाँ यहाँ तक कि उसके मन और बुद्धि से भी। (इसकी विशाल रूप से व्याख्या, मन बुद्धि के अध्याय में
की गई है)।
सभी उद्देश्य, सभी लक्ष्य के पीछे मनुष्य का एक अप्रकट या अचेतन लक्ष्य होता है वह है परम
संतुष्टता, परम विश्राम और परम आनन्द। मनुष्य अपनी इसी अस्पष्ट
कामना के कारण उस विराट अस्तित्व इन लक्ष्यों और उद्देश्यों में ढूंढ़ता और पाता है।
उस स्त्रोत को पा लेना जो उसक खुद का स्वभाव है, एक रहस्यमय पहेली
उसके जीवन काल में बनी रहती है। उद्देश्य
मुक्ति के परम उद्देश्य तक पहुँचे के लिए उसे उद्देश्य पूर्ण
जीवन को ही चुनना पड़ेगा। अपने `स्व' से
टूट जाने के कारण व्यक्ति वहाँ से बहुत दूर एक ऐसे घुमावदार रास्ते पर खड़ा हो गया
है, जिसमें बहुत से चौराहे भी हैं, भटकने
की सम्भावना बनी रहती है, परन्तु फिर भी पुन अपने मूल उद्देश्य
या स्त्रोत तक पहुँचना असम्भव नहीं। उस रास्ते पर हिम्मतहीन होकर उदास और निराश होकर
बैठ जाना उचित नहीं है। उसे उठना पड़ेगा और शक्ति भी पैदा करनी पड़ेगी ताकि उस स्त्रोत तक वापस लौटा जा सके।
इसके लिए उद्देश्यपूर्ण जीवन
परम आवश्यक है। ताकि नित नई चुनौतियों की चोट से आन्तरिक ऊर्जा पैदा होती चली जाए।
दूसरा स्त्रोत होगा उद्देश्य में सफलता हासिल होने से। वह नई शक्ति मनुष्य में आत्म-विश्वास और खुशी प्रगट करेगी। उद्देश्य पूर्ण व्यक्ति की जीवन व्यवस्था में
अनुशासन आना प्रारम्भ हो जायेगा। अनुशासन से जहाँ एक तरफ शक्तियों का धुवीकरण प्रारम्भ
हो जाता है, वहीं दूसरी तरफ शक्तियों की बचत होनी प्रारम्भ हो
जाती है। शक्ति का जो स्त्रोत क्षीण था वह आगे जीवन में सरिता की मोटी धारा बन जाती
है, फिर सबकुछ सम्भव है।
आजकल ध्यान पर बहुत-सी नई खोजें की गई हैं। आज ध्यान का महत्त्व सभी दिशाओं में सभी तरह के व्यक्तियों
के लिए सर्वाधिक प्रभावी ढंग से उभर कर सामने आया है इसलिए आज ऐसे अनेक ध्यान केद्र,
राज योग केद्र हैं जो इन अचेतन, परन्तु प्रभावशाली
शक्तियों के जागरण में सहायक है। यदि कोई चाहे तो इसको अपने उद्देश्य में जोड़कर मंज़िल
तक बिना भटके पहुँच सकता है। ऐसा बहुत से लोगों का भी मानना है। इसलिए महान् और दिव्य
जीवन के लिए उद्देश्य का निर्धारण जीवन में परम आवश्यक है।
(समाप्त)


