क्वांटम भौतिक
शरीर यांत्रीकी और आध्यात्मिक जीवनोद्देश्य
आध्यात्म और विज्ञान के समन्वयात्मक
नूतन जीवन दृष्टि के विशाल पृष्ठ भूमि में मनुष्य अपने जीवन उद्देश्य का निधारण कैसे
करें यह आज एक विचारनीय प्रश्न है। थोड़ा कम या अधिक आज समस्त मानव जाति की जो अन्तर्कथा
है,
उसकी अन्तर्व्यथा है उसका केद्र बिन्दू है सतत् अप्राप्ति का दुःखद अहसास।
कोई न कोइ अप्राप्ति की बोध वेदना उसके शांति को कम्पित ही करती रहती है। धन की कमी,
स्वास्थय की कमी, कभी सम्बन्धों में मधुरता की
कमी, तो कभी सम्मान की कमी और न जाने इस तरह की अन्य कितने ही
प्रकार की कमी से भरपूर जीवन परतंत्रता, भय और असुरक्षा में सिसकती
रहती है। इतनी भौतिक समृद्ध के बाद भी उदासी, तनाव, बेचैनी, चिन्ता और दुःख में मानवीय सभ्यता दम तोड़ रही
है। ऐसा पहले कभी नहीं था। इसका कारण है आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि
की कमी।
आज विज्ञान क्वांटम भौतिक मानवीय
देह यांत्रिकी में बहुत आगे बढ़ चुका है। उसके नक्शे में एक बार फिर आध्यात्मिक व्याख्या
ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।
सर्वप्रथम हम
थोड़े में यह देखें कि क्वांटाम सिद्धान्त क्या है?
क्वांटाम यांत्रिकी के महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्तों में एक है, तरंग कण द्वेतता का सिद्धान्त। किन्हीं
विशेष परिस्थिति में प्रकाश भी कण जैसा व्यवहार कर सकता है। तरंग-कण द्वेतता के नियम के अधीन पदार्थ का अंतिम कण परमाणु तथा इलेक्ट्रोन,
कभी कण तो कभी तरंग के रूप में व्यवहार कर सकता है। इस सिद्धान्त का
सम्पादन `लूइ द ब्रंगिल' ने किया था `मैक्स प्लांक' नाम के वैज्ञानिक ने क्वांटाम सिद्धान्त
का प्रतिपादन किया जिसमें उन्होंने पदार्थ द्वारा ऊर्जा का अवशोषण तथा उत्सर्जन विविक्त
(डिस्क्रट) ऊर्जा पैकेटो में होता है,
जो क्वांटाम कहलाता है। इस सिद्धान्त से प्रेरित होकर `आइंस्टाइन' ने प्रकाश के क्वांटाम यानी `फोटोन' की नई आवधारणा दी। प्लांक तथा आइस्टाइन की इस
अवधारणा को हाइड्रोजन के परमाणु पर लगा कर `निलवोर' नामक वैज्ञानिक ने परमाणु ऊर्जा अवस्था में ही रह सकता है। जब परमाणु एक ऊर्जा
अवस्था से दूसरी ऊर्जा अवस्था में प्रवेश करता है तो वह फोटोन कणों के रूप में ऊर्जा
को अवशोषित तथा उत्सार्जित करता है। ऊर्जा की इस अवस्था को क्वांटाम अवस्था कहते हैं।
द्वेत-कण-तरंग फल की यह अवस्था क्वांटम
यांत्रिकी सिद्धान्त में यह अवस्था है जो अनिश्चितता लिए आकाश में फैली रहती है।
-- विज्ञान प्रगति 2 फरवरी की पत्रिका के आधार से
मन मस्तिष्क
में क्वांटम स्तर की ऊर्जा का अन्तर सम्बन्ध
भारतीय आध्यात्म में परासामान्य
घटना या चमत्कारिक घटना को आत्मोपलब्धि या परमात्मोपलब्धि के मार्ग में अनुषांगिक प्रतिफलन
माना जाता रहा है। मूल उद्देश्य कदापि नहीं, परन्तु पश्चिम के परा
मनोवैज्ञानिक `विलियम बैरेट' ने
1888 के आस पास महत्त्वपूर्ण ढंग से इसका शोध प्रारम्भ किया।
1928 में भौतिक शास्त्री `हैंसबर्ग' ने मस्तिष्क में लय बद्ध उर्मियों के रूप में उठ रही विद्युत तरंगों का पता
लगाया। जिसे अल्फा, बीटा, थीटा और डेल्टा
तरंगों के रूप में जाना जाता है। अतीन्द्रिय स्थिति और इन तरंगों के अन्तर सम्बन्धों
की व्याख्या पहले हो चुकी है। मन और पदार्थों के अन्तर सम्बन्धों में उत्पन्न प्रभाव
की व्याख्या को साइकोकाइनेसिस कहा जाता है। क्वांटाम सिद्धान्त के परिपूरक सिद्धान्त
ने मन के अस्तित्व तथा पदार्थ के साथ उसके अंतर सम्बन्धों को सिद्ध कर दिया है। नोबल
पुरस्कार विजेता `यूजोन बिगनर' ने कहा कि
``सही स्थिति यह है कि समस्त सवीय पदार्थ जिस चेतना को प्रभावित
करता है वह उससे प्रभावित भी होता है''। इसलिए समस्त अतीन्द्रिय
चमत्कार या ज्ञान जैसे (1) विचार संप्रेषण (2)
दूर-दृष्टि (3) पूर्वाभास
(4) भूताभास इन सभीबातों का अन्तर सम्बन्ध या कार्यकारण
प्रगट हो या अप्रगट वह क्वांटम सिद्धान्त से जुड़ रहा है। और प्रतिदिन विज्ञान इसके
नज़दीक आता जा रहा है।
आज पदार्थ विज्ञान, जीव विज्ञान, और चिकित्सा विज्ञान की पुरानी मान्यताएँ
खण्डित हो रही है। जगत पदार्थ है यह मान्यता खण्डित हो गई हैं। आज हम पदार्थ से ऊर्जा
के अस्तिव में प्रवेश कर रहे हैं। भौतिक कणों से दूर हम अभौतिक कणों की ओर बढ़ रहे
हैं जहाँ से पूरा विज्ञान, मनोविज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान
का क्षेत्र प्रारम्भ होता है। आज मन और संकल्प-शक्ति का प्रभाव
पदार्थ और जीवन के क्रिया-कलापों के अन्तर सम्बन्धों पर स्पष्ट
दृष्टिगोचर होने लगा हैं। वैज्ञानिकों ने ऐस अति पारमाण्विक सूक्ष्म कणों की खोज की
है जिसमें भार घनत्व, विस्फोटन और चुम्बकीय क्षेत्र आदि भौतिक
लक्षण है ही नहीं। अभौतिक होने के कारण इसका भौतिक कणों उन्हें रोक ही नहीं पाते। जिसे
वे न्यूट्रीनों कहते हैं। ये हमारे शरीर के अन्दर बाहर पृथ्वी के चारो और प्रकाश से
भी अधिक वेग से गतिशील है। ये कण अति विशिष्ट अवस्था में ही सहयोग वश आपस में टकराते
हैं टकराहट की इस विशिष्ट अवस्था में ही वैज्ञानिकों को इसके अस्तित्व का पता चला है।
गणित शास्त्री `एड्रियोड्रोस्क' ने इस आधार
से नये सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसमें `न्यूट्रीनों'
के समान 'साइत्रोन` कणों
की कल्पना की जो मस्तिष्क के न्यूरोन कणों से जुड़कर पराचेतना का मार्ग प्रशस्त करते
हैं। भौतिक शास्त्री `रदरफोर्ड' ने कहा
है `मनुष्य की नारी व्यवस्था; पर न्यूट्रीनों
कणों का महासागर प्रभाव डालता है। न्यूट्रीनों की तरह माइनडरीनो कणों की भी खोज की
गई हैं। इस वैज्ञानिक व्याख्या का तात्पर्य यहाँ इतना ही है कि बिना आध्यात्मिक जागरुकता
के सफल और सुखद जीवन सम्भव ही नहीं। इस वैज्ञानिक सत्य को तो अनदेखा किया ही नहीं जा
सकता।
-- कादम्बनी, नवम्बर 1993
लेखक : बच्छराज दुग्गर के आधार से
(शेष भाग 9 पर)


