विद्यार्थियो, इन्हें अपनाओ और सदा सुख पाओ! (Part – 13)

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विद्यार्थियो, जिसके व्यक्तित्व का ठीक विकास हुआ होता है, वह उदारचित्त होता है। वह संकीर्ण विचारों वाला, ईर्ष्यालु या घृणा एवं द्वेष करने वाला नहीं होता। वह निर्धनों को तथा दलित जातियों में उत्पन्न लोगों को घटिया नहीं मानता, उनसे दुर्व्यवहार करता है।

वह हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई इत्यादि धर्मभेद के आधार पर या रंग-भेद, भाषा-भेद, राष्ट्र-भेद आदि के आधार पर दूसरों से अनादरपूर्वक, घृणायुक्त और अनुचित बर्ताव नहीं करता बल्कि सभी में आत्मा को देखते हुए, सभी को एक परमपिता परमात्मा की संतान निश्चय करते हुए उनसे भ्रातृत्व की भावना से सद्व्यवहार करता है।

वह सभी जातियों, वंशों, धर्मों आदि के संसार रूप एक ही बगीचे के रंग-बिरंगे फूल या एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ मानकर उन्हें एक ही मानव-कुटुम्ब के सदस्य अथवा एक ही समाज रूपी शरीर के विभिन्न अंग मानकर चलता है। सभी के प्रति उनके मन में सदा शुभभावना और शुभकामना बनी ही रहती है और वह सभी से स्नेह करता तथा सभी को सहयोग देता है। अत विद्यार्थियो, इन्हीं भावों को अपनाओ और सदा सुख पाओ।

  • विद्यार्थियो, आज कई लोग अच्छाई और बुराई के भेद को ही स्वीकार नहीं करते अथवा नहीं जानते हुए भी उस ज्ञान के अनुसार आचरण नहीं करते। परन्तु अब तो शरीर विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान के द्वारा हुए परीक्षणों से भी स्पष्ट है कि अच्छे और बुरे कर्मों, गुणात्मक और ऋणात्मक कर्मों में अन्तर है।

  • उन्होंने एलैक्ट्रो एनसिफिलोग्राम द्वारा मस्तिष्क से निकलने वाली विद्युत-तरंगों की तथा एलैक्ट्रो कार्डियोग्राम द्वारा हृदय की गति की जाँच की है और यंत्रों द्वारा व्यक्ति के पुट्ठों के भी तनाव का निरीक्षण किया है और देखा है कि जब किसी व्यक्ति में क्रोध का संवेग होता है तो उसके मस्तिष्क से जो विद्युत-तरंगें विकीर्ण होती हैं वे शान्त व्यक्ति की तरंगों से भिन्न होती हैं।

  • उन्होंने यह भी पाया है कि उस समय हृदय की गति भी अधिक तेज होती है और पुट्ठे भी तन जाते हैं। इन परीक्षणों के परिणामों को जाँचने से वे इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि क्रोध के प्रभाव से मनुष्य के शरीर की कई ग्रंथियों से ऐसे रस निकलते हैं जिससे उसकी स्वचालित स्नायु तन्तु तंत्रिका पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है और उसके मस्तिष्क, हृदय, फेफड़ों, पुट्ठों सभी पर ऐसा बुरा प्रभाव पड़ता है कि जिससे उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है, उसकी रोगनाशक शारीरिक क्षमता कम होती जाती है और हृदय रोग, श्वास रोग आदि-आदि अनेकानेक भयानक रोग घेरते हैं।

  • उसका रक्तचाप बढ़ जाता है और उस मानसिक तनाव के कारण उसे कैंसर तक के भयानक अथवा प्राय असाध्य रोग भी हो जाते हैं। घृणा, द्वेष आदि के भी बुरे ही प्रभाव शरीर तथा मस्तिष्क पर पड़ते हैं। शरीर को हानि पहुँचाने के अतिरिक्त, समाज के लिए भी तो ऐसे कर्म दुःखोत्पादक होते हैं। क्रोधी व्यक्ति दूसरों के मन को भी अशान्त करता है, तोड़फोड़ करता है, अपराध में प्रवृत्त होता है और जाने कितनी प्रकार sि कुकृत्य करता है।

  • आज संसार में हिंसा, लड़ाई-झगड़े, मारकाट सब इसी के कारण ही तो हैं जिससे कि समाज को आर्थिक हानि भी होती है और अनेकानेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार, मनुष्य के जिन कर्मों से चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, घृणा, द्वेष, तनाव, उत्तेजना, उक्साहट, फुसलाव आदि होता है और संसार में नैतिक नियम तथा मर्यादा भंग होती है तथा अशान्ति, रोग और आर्थिक एवं शारीरिक दुःख पैदा होते हैं, वे बुरे कर्म ही तो होते हैं। इसके विपरीत, जिन कर्मों से स्वास्थ्य, सुख-शान्ति, आर्थिक प्रगति आदि होती है तथा सभी हर्षोल्लास और प्रेम, एकता तथा सहयोग से रहते हैं, वे अच्छे कर्म होते हैं।

  • अत विद्यार्थियो, यह कहना ठीक नहीं है कि अच्छाई और बुराई में कोई अन्तर नहीं है और कि ये दोनों मनुष्य के अपने मनमाने विचारों पर आधारित हैं बल्कि सत्यता तो यह है कि अच्छाई अथवा पवित्रता ही सुख-शान्ति की जननी है और बुराई या अपवित्रता ही सभी दुःखों का मूल है। काम वासना, क्रोध का संवेग, लोभ की वृत्ति, मोह की उत्पत्ति और अहंकार का आक्रमण ये ही संसार में सभी प्रकार की अशान्ति के जन्मदाता हैं।

  • आप इन पर विजयी बनो और ब्रह्मचर्य, धैर्य, सहनशीलता, संतोष, अनासक्ति और नम्रता को अपनाओ, दिव्यता को जीवन मतें लाओ और सदा सुख पाओ।
आपका प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में तहे दिल से स्वागत है।

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