दृष्टिकोण (Part 4)

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(भाग 3 का बाकि)

सकारात्मक नकारात्मक दृष्टिकोण में फर्क

2. स्थगित करने या टालमटोल का दृष्टिकोण : मन के जगत में, भावों और विचारों के तल पर कल करो, सो आज कर यह वह महान् क्रान्तिकारी सूत्र है। जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति सहज सफलता के स्वर्ण शिखर को ही स्पर्श कर सकता है। भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्र में उपलब्धि की दिशा में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका का कोई मुकाबला नहीं है। इस बात को अगर कोई ठीक-ठीक समझ ले तो संकल्पित लक्ष्य की दिशा में तीव्रता सहज ही सम्भव हो जायेगी।

कल करे सो आज कर : हमें किसी कार्य के संकल्प को `कल कर लेंगे' की तिजोरी में बन्द नहीं कर देना चाहिए। अक्सर लोगों के जीवन को देखेंगे तो उनका जीवन एक लम्बा स्थगन ही है। 20-25 वर्ष किसी व्यक्ति का पढ़ाई लिखाई में चला जाता है। वह प्रतिदिन यही देखता और सोचता है कि भविष्य में जब वह पढ़ लिखकर कोई योग्य पद प्राप्त कर लेगा, फिर आराम से ज़िन्दगी जीयेगा। अभी तो मेहनत है, पढ़ाई का पुरुषार्थ है।

20-25 वर्ष तो आपके जीने की तैयारी में बीत जाता हैं। इस प्रकार जब उसे अपना मन पसन्द पद मिल भी जाता है फिर भी वह शादी तथा बाद में पैदा होने वाले बच्चों के अच्छे भविष्य के निर्माण के बारे में सोचता है और उसके भविष्य के लिए धन का संचय प्रारम्भ कर देता है। उसका जीवन फिर अगले 20-25 वर्ष के लिए ठहर जाता है। आप ज़रा सोचिए, एक व्यक्ति अपने जीवन के 40-50 वर्ष तो जीने की प्रतीक्षा में ही बिता देता है।

50 साल तक जीने के पुराने ढर्रे तो तब तक उसके वही पुराने अन्दर जीने के प्रति स्थगित करने और प्रतीक्षा करने वाले दृष्टिकोण के संस्कार या आदत का निर्माण भी कर देता है। प्रश्न उठता है कि क्या वह अपनी उस पुरानी स्थगित करने की आदत से मुक्त हो प्रति पल जीने का एक नया आनन्द पा सकता है?

कई लोग इस काम को `कल कर लेंगे', `आज छोड़ों' वाली नीति में अपने ऊपर ढेर सारे कामों का बोझ डालकर, मानसिक रूप से घसीटते हुए जीवन बिताने लगते हैं। जिसके कारण वे अपने अंन्दर चिड़चिड़ापन और मानसिक खिन्नता का अनुभव करते हैं। टालमटोल का यह दृष्टिकोण उनकी सफलता को बाधित कर देती है। जीवन कल नहीं आज है।

आपको एक बार में कुदरत से एक ही क्षण या एक ही श्वास मिलता है। जब आप उस क्षण को पूरा कर लेते हैं उसके बाद दूसरा क्षण या दूसरी श्वास आपको मिलती है। यदि आपका आज खुशनुमा है तो आपका कल भी खुशनुमा होगा ही। कल के लिए योजना अवश्य बनाएं लेकिन आज को भरपूर खुशियों में बितायें।

``अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत'' वाली कहावत जैसा मनुष्य का जीवन कदापि नहीं होना चाहिए। कहीं आपको ऐसा सोचना नहीं पड़ जाये कि मैं इस काम को तो कर सकता था लेकिन नहीं किया। काश, यदि इस काम को कर लिया होता तो मुझे बहुत अधिक फायदा हुआ होता।

अभी नहीं तो कभी नहीं : मन के जगत में एवं भाव के जगत में यह वह महान् क्रान्तिकारी सूत्र है, जिसके द्वारा व्यक्ति सहज ही सफलता के शिखर को स्पर्श कर सकता है। सांसारिक उपलब्धियों में तो इसका महत्त्व है ही, लेकिन आध्यात्मिक जगत में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका का जवाब नहीं। यदि यह बात हमारी समझ और स्वरूप में आ जाये तो हमारे पुरुषार्थ की तीव्रता में चार चाँद लग जायेंगे। लेकिन साधारणत ऐसा क्यों नहीं होता है, इसके कारण और निवारण पर विचार करें?

स्थगित (Postponed) करने का संस्कार : विश्व विख्यात लेखक मार्क ट्वेन (सेमुअलक्लकीमेंस) अपने बारे में लिखते हैं, जब वे एक सभा में एक पुरोहित से प्रवचन सुन रहे थे, तो उसने उन्हें बड़ा ही प्रभावित किया था। उन्होंने सोचा  ``मेरे जेब में 100 डालर हैं, क्यों न इसे आज दान कर दूँ''

मार्क ट्वेन लिखते हैं –– ``10 मिनट के बाद मेरे विचार बदल गये और मैंने सोचा कि 50 डालर सही रहेगा''। अब वे प्रवचन नहीं सुन रहे थे। 100 के कारण वे अपने अन्तर वार्तालाप में डूब गये। आधे घण्टे के बाद उनका विचार 50 डालर से घटकर 5 डालकर देने तक आ गया, जो प्रवचन के सामाप्ति तक 1 डालर रह गया था। जब दान की थाली के सामने वह आया तो उसने उसमें 1 डालर डालने के बदले चुपके से 1 डालर उठाने की सोच में लगा था। क्योंकि उस समय वह यह सोच रहा था कि कौन देखता है? किसको पता है?

शिवभगवानुवाच : ``बच्चे, श्रेष्ठ पुरुषार्थ के संकल्प को `कल कर लेंगे' की तिजोरी में बन्द नहीं कर देना, नहीं तो वे सड़ जायेंगे''। जैसे ताजा फल है, यदि उसे कुछ दिनों तक रख देने के पश्चात् खाया जाये तो क्या होगा? या तो वो सड़ जाएगा या सूख जाने के फलस्वरूप उसमें विटामिन नष्ट प्राय हो जायेगा। दोनों ही हालत में वह फायदेमन्द नहीं है। ताजी गरम-गरम रोटी और दो दिन के बाद की बासी रोटी में कितना अन्तर आ जाता है।

ठीक इसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुषार्थ के लिए आए संकल्प को तुरन्त ही कर लेना चाहिए। उसे `कल कर लेंगे' की तिजोरी में नहीं रख देना चाहिये। कारण, एक तो उस समय आत्म-प्रेरणा और उसको सम्पन्न करने की शक्ति उस संकल्प को स्वत प्राप्त होती है। संकल्प अति सूक्ष्म और संवेदनशील होता है। यदि वह कृत्य नहीं बना तो हो सकता है वह संकल्प या तो बदल जायेगा या फिर उसमें करने की शक्ति क्षीण हो जायेगी। यदि कोई श्रेष्ठ और शुभ संकल्प आता है, तो प्राय हम यही सोचते हैं –– अच्छा इसे कल कर लेंगे या अमृतवेले से शुरू कर लेंगे इत्यादि-इत्यादि टालने या स्थगित (Postponed) करने के संस्कार हमारे अन्दर से प्रगट होने लगते हैं।

आज करो सो कल कर : लेकिन यदि क्रोध आता है, तो उसी क्षण उसे हम करने लग जाते हैं। स्थगित नहीं करते हैं। होना ये चाहिए था कि क्रोध करने के संकल्प को हम कल के लिए स्थगित कर देते और शुभ संकल्पों को, पुण्य कर्मों को, योग को, दान को हम अभी-अभी कर लेते। लोग प्राय श्रेष्ठ और शुभ के बारे में सोचते और विचारते अधिक हैं और करते कम हैं, परन्तु, अशुभ या क्रोध के बारे में हम कम सोचते विचारते हैं और ज़रा भी स्थगित नहीं करते, तक्षण कर देते हैं।

जीवन में वैराग्य के शुभ संकल्प न आ जायें इसके लिए हम सोचते हैं कि कहाँ विनाश?... कहाँ समाप्ति? कहाँ मृत्यु, अभी जीवन का बहुत समय पड़ा है अन्त में कर लेंगे –– इस तरह अन्त को हम दूर तक टालते रहते हैं। जब अन्त आता है तो हमें पता नहीं चलता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं –– हत्याएँ, आत्म-हत्याएँ तभी संभव है जब संकल्प तक्षण कर्म बन जाते हैं। यदि उसे `कल' पर स्थगित कर दिया जाये या उस मनोभाव को थोड़े क्षणों के लिए रोक लिया जाये फिर यह पाप-कृत्य संभव नहीं हो सकेगा। ठीक उसी प्रकार शुभ भी कल पर टाल देने से उसका होना असम्भव हो जाता है।

यही पल हमारे हाथ में है : मनुष्यात्माओं का संस्कार है कि वे हमेशा या तो अतीत या भविष्य के बारे में ही सोचते हैं। वर्तमान के बारे में नहीं। लेकिन अनुभव यही सिखाता है –– हमारे हाथ में न तो अतीत है और न ही भविष्य। वर्तमान का यह पल बस, हमारे हाथ में है। कल जो आयेगा वह तो वर्तमान की छाया है, आज का अगला कदम है। बस यही पल हमारे हाथ में है। यदि जैसी स्मृति, वैसी सृष्टि, कृति, वृत्ति और दृष्टि का निर्माण होता है।

जीवन को पूर्ण जागरुक बनाना है तो अभी-अभी। कौन जाने कि अगला पल आये न आये। इस क्षण हम अपने स्वमान में स्थित हो जायें या इस पल को ज़रूरतमंदों को सहयोग करने में लगायें। ज़रा सोचिये, ऐसा करने से आपको कौन रोक रहा है? इन कार्यों को सुबह पर क्यों टालना या साँझ पर क्यों टालना? सुबह स्मृति आये तो सुबह, साँझ स्मृति आये तो साँझ, ऑफिस में आये, बस में आये, या कि भोजन के टेबल पर, जब भी ख्याल आये, स्मरण आ जाये तो दिल दर्पण में अपने प्रियतम प्रभु को झाँक लीजिए।

दो मीठी-मीठी बातें कर लीजिए। इस कार्य के लिये आपके जीवन में कौन बाधा डालता है? आप चाहें तो कर सकते हैं। इतने प्रेमपूर्ण, इतनी समग्रता से अपने पल को पुरुषार्थ में बिताइये कि जैसे कोई सूर्य की किरणों को लेन्स के सहारे इकट्ठा कर लें और तक्षण अग्नि प्रज्वलित कर लें। हमारा जीवन ढीला-ढाला ऐसे नहीं हो जैसे बिखरी हुई सूर्य की किरणें। हर पल के पुरुषार्थ में एक प्रशान्त महासागर के गहराई हो, गौरीशंकर की ऊँचाई हो। मगर हम ऐसे जीते हैं जैसे सपाट कोलतार की पक्की सड़क। जहाँ न गहराई है, न ऊँचाई है।

तक्षण करने की आदत डालें : जीवन में जब भी शुभ का संकल्प जागे, उसी क्षण हम शुभ करने के भाव की चोटी पर होते हैं। क्योंकि उसमें परमात्मा और कुदरत दोनों की ही प्रेरणा और उनका बल हमारे साथ होता है। उसमें सोचने जैसा कुछ नहीं है, परन्तु करने जैसा है। देने का भाव, त्याग का भाव, योग का भाव जिस क्षण आये उसी पल उसे कर लेना चाहिए। न जाने अगला पल आये या न आये। फिर ज़रूरी नहीं कि अगले पल यह शक्तिशाली भाव मन के अन्दर बना ही रहे। हम अपने सारे दिन की दिनचर्या में एक नियम बना लें।

जब भी श्रेष्ठ संकल्प आये उसे तक्षण पूरा कर देना है। जब भी अशुभ विचार आये उसे कल के लिए स्थगित कर देना है। इसलिए श्रेष्ठ और शुभ विचारों के लिए `कल करे सो आज कर' और अशुभ विचारों के लिये `आज कर सो कल' वाली कहावत चरितार्थ होती है। वह समय दूर नहीं जब शुभ संकल्प को, तक्षण स्वरूप में परिवर्तन करने का नया संस्कार आपके अन्दर निर्मित होने लग जायेगा।

सेवा करना हो तो तक्षण, प्रभु को याद करना हो तो तक्षण और क्रोध करना हो तो 24 घण्टे के बाद। फिर सफलता के लिए हम जैसा पुरुषार्थ करना चाहे वह संभव हो सकेगा। ऐसे लोगों की जीवन बगिया में खुशियों के बसन्त आ जाते हैं, उमंग-उल्हास के फूल खिल जाते हैं, जिसकी खुशबू आत्मा को अलौकिक आनन्द में मदमस्त कर देती है।

जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि : इसके सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध कहानी है। चार नेत्रहीन व्यक्तियों से एक हाथी के बारे में पूछा गया कि वह क्या चीज़ है? उनके पास जानने की व्यवस्था तो मात्र स्पर्श की ही होती है। जब अलग-अलग उन्हें हाथी के पास ले जाया गया तो सभी ने हाथी का स्पर्श किया और उसके बारे में अपना जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, देखिए कितना हास्यास्पद था?

एक ने कहा ``हाथी दीवाल जैसा होता है'' क्योंकि उसने हाथी के मध्य के एक समतल हिस्से का स्पर्श किया था। दूसरे ने कहा ``हाथी खम्भे जैसा होता है'' स्वाभाविक है उसने हाथी के टांग का स्पर्श किया होगा। तीसरे ने कहा हाथी कुछ-कुछ अजगर से मिलता जुलता है। क्योंकि उसने हाथी की सूंढ़ को छुआ था। हाथी विशाल पंखे जैसा है, चौथा व्यक्ति जिसने हाथी के कान का स्पर्श किया था उसने कहा उसका दृष्टिकोण हाथी के प्रति पंखे जैसा था। इसका अर्थ है, सीमित जानकारी, सर्वांगीण दृष्टिकोण के प्रति अत्यधिक बाधक है। इस प्रकार के सीमित दृष्टिकोण मनुष्यों की वांछित सफलता की प्राप्ति को कम कर देती है।

शेष भाग - 5

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें।
आपका तहे दिल से स्वागत है।

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