भाग्यनिर्माण में इच्छा-शक्ति (Part 1)

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भाग्यनिर्माण में इच्छा-शक्ति, विचार-शक्ति और क्रिया-शक्ति का महत्त्व

हमारे जीवन का ताना-बाना मिले-जुले, अच्छे-बुरे धागे का बना है।

–– सेक्शपीयर

भाग्य और पुरुषार्थ के बीच मे कर्म के नियम की न्यायशीलता और अपरिवर्तनीयता का अद्भुत रहस्य साधारणत हमें पता नहीं होता है, परन्तु कर्म के नियम की अपरिवर्तनीयता, बना बनाया नाटक, भाग्य और हमारा प्रयास, ये सभी बातें किसी--किसी एक बिन्दू पर अवश्य ही मिलती है। परन्तु इस रहस्यमय बिन्दू का दर्शन अति मुश्किल है। फिर भी इस रहस्यमय बिन्दू के निकट पहुँचे उन महान् लोगों के जीवन में एक बात तो स्पष्ट देखने को मिलती है। वह है कर्म के प्रति क्रियाशीलता तथा परिणाम या फल से अप्रभावित निश्चिन्तता और प्रसन्नता। आइये, इन सभी बातों पर आलोक डालकर थोड़ा विचार विमर्श करें शायद कुछ रहस्य हाथ लगे और यह जीवन सफल हो।

यह सर्व सम्भव है यदि व्यक्ति कर्म के अनादि, महान्, प्रेमपूर्ण और न्यायपूर्ण नियम को जानते हुए फल पाने की दिशा में कर्म करें। सफलता की प्राप्ति की दिशा में कौन-कौन-से अवरोध पैदा होते हैं। भाग्य के निर्माण में, कर्म के कार्य कारण के सिद्धाँत को अच्छी तरह समझते हुए, कर्म की महान् शक्ति को पहचाने और जीवन में पुरुषार्थ और प्रालब्ध के अन्तर सम्बन्धों के रहस्य को अच्छी तरह जानते हुए प्रयास करे तो निश्चय ही जीवन में सफलता और सफलता प्राप्त होगी। सफलता प्राप्ति का श्रेष्ठ तरीका जानकर उसे कार्य में लगने से पहले संक्षेप में कर्म के महान् नियमों को आप थोड़ा अवश्य जानें। इस के लिए कर्म के कार्य कारण पर थोड़ा लिखना उपयुक्त रहेगा।

 

कर्म

मनुष्य के तीन तरह के कर्म होते हैं ––

1. प्रालब्ध कर्म

2. क्रियामान कर्म

3. संचित कर्म

 

1. प्रालब्ध कर्म : इसमें अच्छा फल या बुरा फल दोनों ही आ जाते हैं। यह फल किसी व्यक्ति के पिछले जन्म का भी हो सकता है और उसके इस जन्म का भी हो सकता है। लेकिन वह हमेशा भूतकाल के कर्मों का परिणाम है। जीवन में इस तरह की नज़दीकी परिस्थिति से मनुष्य इस प्रकार बंध जाता है कि कभी-कभी उस दिशा में पुरुषार्थ से भी वह छूट नहीं पाता है। उसे कर्मों को भोगकर ही निपटारा करना पड़ता है, परन्तु इसका अर्थ वह नहीं है कि हम यह सोचकर दुःखी होकर बैठ जाये और यह सोचें कि ``जो मेरे भाग्य में होगा वही मिलेगा'' या ``कर्म का लेख टाले नहीं टलता''। नहीं, ऐसा नहीं है। भाग्य में दोनों तरह के कर्म हैं। कर्म की तुला के दोनों पलड़े पर कुछ--कुछ वजन तो है ही। थोड़े प्रयास से दुःख वाले पलड़े को हल्का किया जा सकता है। भाग्य के निर्माण में कर्म में तीन शक्तिशाली रूप है। विचार-शक्ति, इच्छा-शक्ति और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शक्ति कर्म की शक्ति है। परमात्मा से योगयुक्त सम्बन्ध के माध्यम से इन शक्तियों को सही दिशा में प्रयोग कर प्रालब्ध को हल्का किया जा सकता है। आगे इसकी व्याख्या संदर्भ में होगी।

2. क्रियामान कर्म : वह कर्म जो वर्तमान में हमारे द्वारा सम्पादित होता है। क्रियामान कर्म में कुछ तो हमारे प्रालब्ध कर्म होते हैं जिसे करने के बाद वह तक्षण समाप्त हो जाते हैं और कुछ भविष्यकाल के लिये संचित हो जाते हैं।

3. संचित कर्म : यही हिसाब-किताब समय के अन्तराल में प्रालब्ध कर्म या भाग्य के रूप में हमारे अगले या इसी जीवन में आता है।

जाने-अनजाने प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म की कलम से अपने भाग्य का निर्माण करता ही रहता है। सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय इत्यादि सबकुछ इन्ही कर्मों की गुह्य और गहन गति के अंदर होता रहता है। जीवन के अनन्त विसंगतियों में यह कर्म का सिद्धाँत कार्य करता है। अब आपके ऊपर यह निर्भर करता है कि कितनी तत्परता से इस गुह्य पहेली को जानकर फिर आप कर्म क्षेत्र में सफलता पाने के लिए कूद पड़ते हैं।

कार्य –– कारण के नियम

कर्म अर्थात् काम। यह काम पहले कामना से उत्पन्न होता है, फिर आता है उसको पूरा करने के लिए विचार जिससे उसका आकार-प्रकार इत्यादि का निर्धारण होता है। तीसरा है क्रिया-शक्ति। इच्छा-विचार-क्रियामान शक्ति प्रत्येक काम हमारे पूर्ववर्ती अमूर्त्त कामनायें और विचार का साकार रूप है।

जब प्रत्येक कार्य सम्पादित हो रहा होता है उसके साथ ही नई कामना और विचार उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार कार्य कारण के नियम कर्म शक्ति के परिवर्तन का नियम है।

कर्म के नियम स्वाभाविक कार्य करते हैं। इसे नैसर्गिक नियम भी कह सकते हैं। इस नियम में किसी भी बाह्य-शक्ति का कोई भी हस्तक्षेप नहीं  होता है।

उदाहरण : कोई व्यक्ति किसी की हत्या कर के न्यायालय से तो बच सकता है, परन्तु कर्म के अकाट्य अन्तर नियमों से कदापि नहीं बच सकता है।

नैसर्गिक या वैज्ञानिक नियम के तहत कार्य-कारण के सिद्धाँत के अन्दर यदि कोई अग्नि का स्पर्श करता है तो अवश्य ही जल जायेगा। ठीक उसी प्रकार कर्म के नियम नैसर्गिक नियम के साथ-साथ सूक्ष्म जगत के नियमों और शक्तियों को ध्यान में रखकर अपना कार्य करता है। परिणाम आने में जल्दी या देरी हो सकती है। आध्यात्मिक मनुष्यों को यह बात थोड़ा ज़्यादा स्पष्ट है कि मनुष्य का बहुत बड़ा हिस्सा सूक्ष्म जगत से सम्बन्धित है।

शेष भाग - 2

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें।
आपका तहे दिल से स्वागत है।
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