(भाग 1 का बाकी)
असम्भव
समझे जाने वाले कार्यों को सम्भव होने में अब तक का इतिहास साक्षी है कि यह सभी कल्पनाशक्ति
द्वारा ही हो सकता है। इस दुनिया में जितने भी महान् लोग हुए हैं और उन्होंने इस जगत
को जो भी कुछ महान्, सुन्दर और उपयोगी कृति उपहार स्वरूप दी
है, उसमें उनकी मनोरम विलक्षण कल्पनाशक्ति का ही हाथ है। उनके
रचना या निर्माण में इसी कल्पनाशक्ति की अदृश्य छाया है।
चाहे
महर्षि रविद्र नाथ ठाकुर की गीतांजली हो या गोर्की का उपन्यास, राइट बन्धुओं का हवाई जहाज हो या जेम्सवाट की भापशक्ति, सभी अविष्कार और कलात्मक पैटिंग के पीछे उस कल्पनाशीलता का ही हाथ है।
कई
लोग उन लोगों को पूर्ण अव्यवहारिक और बेकार समझते हैं, जो कल्पना किया करते हैं। उन लोगों पर वे यही फितरे कसते हैं कि यह तो ख्याली
पुलाव पकाता है या मन के लड्डू खाता है या हवाई किला बनाता है। थोड़े अंश तक तो यह
ठीक भी है, क्योंकि यदि उसे पूरा करने के लिए उसमे दृढ़ संकल्प
तथा उसे साकार करने के लिए आत्म-विश्वास, तीव्र क्रियाशीलता, लगन तथा योग्यता न हो तो...।
लेकिन
जिन्हें कुछ करना है, इच्छित फल को प्राप्त करने में सफलता
प्राप्त करना है, वह कोरी कल्पना क्यों करेगा! उन सभी संकल्पों के पीछे, उसका दृढ़ विश्वास,
बलवती आशा, प्रबल संकल्प और प्रभावशाली प्रयत्न
का अदृश्य हाथ अवश्य ही होगा, परन्तु सफलता का आत्म-विश्वास यदि उस आदर्श कल्पना-शक्ति से जुड़ जाता है तो
निश्चय ही एक चुम्बकीय केद्र का निर्माण आपके अन्दर अपने आप हो जायेगा। वह स्वाभाविक
रूप से सभी अनुकूल परिस्थिति या परिवेश को चुम्बक की तरह आपके चारों ओर आकर्षित कर
एकत्रित कर देगा और आपकी क्रिया-शक्ति उसे पूरा करने में धीरे-धीरे अपने आप क्रियाशील होने लगेगी।
हे
विवेकशील प्राणी! कल्पनाशीलता का गुण भी वास्तव में अन्य
पावन गुणों की तरह परमात्मा ने आपको महान् उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही प्रदान किया
है। कहावत है ''जैसा चित्र, वैसा चरित्र``। लक्ष्य पूर्ति के मार्ग में अनेक कष्टपूर्ण और थका देने वाली बाधायें आयेंगी
अवश्य, परन्तु यही मनोरम और रंगीन कल्पनाशक्ति आपके अन्दर नूतन
बल का संचार करती रहेगी।
कल्पना
चमत्कारिक शक्ति और कवि की प्रतिभा का प्रमाण है।
-- कोलरिज
कल्पना-शक्ति अपने बिम्बों को सत्य का रम्य रूप प्रदान करती है और यही उसका अभिष्ट
है।
-- गिलवट
इस
बात को अच्छी तरह जान लें कि मनोवांछित इच्छाऐं और मनोरम कल्पनाएँ, मात्र उसकी कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि अर्न्तमन से उत्पन्न
वे प्रेरक समर्थ शक्तियाँ हैं, वे अमूर्त संदेश वाहिकाएँ हैं,
जो उन्हें यह दिशा निर्देश देती है कि यदि पूरे मनोयोग से प्रयत्नपूर्वक
और पूरी दक्षता से उसे कार्य में परिणित कर दिया जाये, तो वह
दिन दूर नहीं जब वे कल्पना अपने सम्पूर्ण सौन्दर्य और उपयोगिता की गरिमा से मंडित होकर
जगत के सामने अपने आप मूर्त हो जायेंगी। ज़रा सोचिये, क्या दुनिया
के वे सभी आश्चर्य मनुष्य के कल्पना की एएयाशी थी। नहीं... नहीं।
वे सभी महान् शिल्प कला, कलात्मक पैन्टिंग, विज्ञान के आविष्कार इन सभी का प्रारम्भ इसी कल्पनाशक्ति की ही देन है।
अध्यात्म
के जगत में और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य उपलब्ध करने की दिशा में भी इसी कल्पना-शक्ति या मन की शक्ति का प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। किसी चीज़
को या किसी उस उत्कृष्ट कल्पना को यदि आप साकार करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उसका स्पष्ट
चित्र आपके मन में आना चाहिए। उसी प्रकार जिस प्रकार एक चित्रकार अपने मन में बिम्बों
को रंग और तुलिका से अपने कैनवास पर अंकित करता जाता हैं।
साथ-साथ उस काल्पनिक बिम्बों को स्पष्टता से उन बनाये जा रहे चित्रों से तुलना
भी करता जाता हैं। जितनी स्पष्ट छवि की कलात्मकता आपके मन में होगी, उतना ही उसकी परिपूर्णता कैनवास पर मूर्त रूप ले सकेंगी।
हे
लोक हितार्थ महामना : प्रभु द्वारा प्रदान
इस दिव्य कल्पना-शक्ति के उपहार को आप जन मंगल की दिशा में ही
उपयोग करें। इसका प्रयोग ऐसे नहीं है जो लोग आपका मजाक उड़ायें। इस अमूल्य वरदान को,
प्रकृति के उस अपूर्व रहस्य के अमूर्त रूप का दोहन कर उसे जनहितार्थ
मूर्त रूप दें।
कल्पना
वह शक्ति है जो प्रत्यक्ष का मानसिक चित्र उपस्थित करती है।
-- डॉ. गुलाबराय
-- हे अपराजित मानव, उठिये, आप हारने
के लिए नहीं अपितु जीतने के लिए इस वसुन्धरा पर आये हैं। सफलता आपका जन्म सिद्ध अधिकार
है। 'किं कर्त्तव्य विमूढ़ हो` के मत बैठ
जाइये। अपने अर्न्तमन से उठ रही उस मन्द, मधुर, प्रेरक ध्वनि को सजगता से सुनिये। ध्यान लगाइये, क्या
आवाज़ आ रही है। हे मानव, आलस्य से अंगड़ाई लो। एक झटके से दुश्चिन्ताओं
की चादर को बाहर फेंक दो और देखो, दूर मंज़िल पर सफलता वरमाला
लिए आपका वरण करने के लिये तैयार है। अपने अन्दर उमंग-उत्साह
के नूतन प्राण वायु को संचरित होने दें। अपनी अनन्त शक्तियों का स्मरण करें। इस संसार
में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको प्राप्त न हो सके।
ज़रूरत
है अपनी उन विलक्षण शक्तियों को कार्य में लगाने की। अपनी समस्त क्षमताओं को समाकर
कार्य सिद्ध में लगाने की। निश्चय जानिए, सफलता की विजयी मुस्कान
की चमक आपके आनन पर अवश्य हो फैलेगी। इसे जानिए कि आपके तरकश में ऐस-ऐसे अमोघ बाण है, ऐसी-ऐसी अपूर्व
शक्तियाँ है जिसका कोई जवाब नहीं है जो अपना लक्ष्य भेदन अवश्य ही करेंगी। आपके मन
के तरकस में तीन तो ऐसे बाण हैं, जो अमोघ हैं और वे हैं ö
आपकी कल्पना-शक्ति, विचार-शक्ति और इच्छा-शक्ति। इन्हीं शक्तियों के बल से और भी
अन्य शक्तियों का प्रादुर्भाव होता रहता है।
-- हे
प्रबुद्ध साधक, यदि आपको जीवन में सफलता हासिल करनी है तो सदा अपनी
अंतिम विजय के लिए आशान्वित रहे। मार्ग में होने वाली छोटी-छोटी
असफलताओं से निराश मत हो जाइए। हे समर्थ द्रष्टा। सभी असफलता क्रमश सफलता के मार्ग
में वे छोटी-मोटी त्रुटियाँ है जिसमें अब आपका परिचय होता जा
रहा है। असफलता के कारणों का एक बार पउत्तर्मुल्यांकन करें और उन कारणों का अपने पुरुषार्थ
को मार्ग से बाहर निकाल फैंकें। मन में सदा आशा का ज्योतिर्मय सूर्य चमकता रहे।
-- हे
महा बाहु,
अपने मन से उन सभी शत्रु-विचार को बड़ी निर्ममता
से निकाल बाहर करें। सदा पूर्ण विश्वास से अपने मन में मित्रभावों का विकास करें। सफलता
अवश्य आपके कदमों में होगी।
अपने
मन तरकश में से उस कल्पना-शक्ति रूपी बाण को जानें।
इस
विश्व नाटक के सूत्रधार ने आपका पार्ट किसी महान् योजना के तहत निर्मित किया है। आपका
जन्म निउद्देश्य या महत्त्वहीन नहीं है। आपका जन्म अपने दुर्भाग्य पर रोने और अयोग्यता
को कोसने के लिए नहीं हुआ है। आप उस करुणामय परमात्मा की संतान हो। आपके जीवन में सुख-शान्ति, समृद्ध आये इसके लिए उनके पास आपके लिए अत्यन्त
सुन्दर योजना है। उठें और आप जिस दिव्य उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं उसके लिए
इस पवित्र और अद्भुत कल्पनाशक्ति को जगायें, उसका उपयोग करें
और विजयी बनें।
आह! कल्पना का सुन्दर यह, जगत मधुर कितना होता।
सुख-स्वप्नों का दल छाया में, पुलकित हो जगता सोता।
-- जयशंकर प्रसाद
(शेष भाग 3)
प्रजापिता
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सपरिवार पधारें।
आपका
और आपके परिवार का तहे दिल से स्वागत है। ओमशान्ति


