(भाग 4 का बाकी)
उद्देश्य और
लक्ष्य में सूक्ष्म फासला
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में
कुछ पाने के लिए अपने लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए। लक्ष्य या उद्देश्य का अर्थ करीब-करीब एक जैसा ही है, परन्तु लक्ष्य अल्पकालीन भी हो सकता
है, परन्तु उद्देश्य जीवनपर्यन्त या जीवन के अंतिम काल तक होता
है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने लक्ष्य को उद्देश्य से जोड़कर जीना चाहिए। जैसे
कोई व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य यह बनाता है कि स्वास्थ्य के सम्बन्ध में मनुष्य
और प्रकृति के रहस्यों के अन्तर सम्बन्धों की खोजकर, महान् चिकित्सक
बन जाये। तो उसे छोटे-छोटे लक्ष्य द्वारा स्वयं के जीवन को प्राकृतिक
ढंग से जीना शुरू करना पड़ेगा। यहाँ लक्ष्य और उद्देश्य करीब-करीब समान है। फिर भी महत्त्वपूर्ण है -- उद्देश्य का
निर्धारण।
असम्भव लक्ष्य
का निर्धारण कभी भी नहीं करना चाहिए
अपनी शक्ति, सामर्थ्य और साधनों का विश्लेषण किये बिना जो व्यक्ति किसी कार्य की योजना
बनाता है, बुद्धिमान पुरुष उसे मूर्ख कहते हैं।
-- नारायण पंडित
लक्ष्य पूर्ति
में तीन कारक तत्व
तीव्रता : यदि आपका प्रयत्न मंद और आलस्यपूर्ण है फिर आप अपने लक्ष्य को नहीं पा सकते
हैं। जीवन उद्देश्य या गंतव्य तक पहुँचने के लिए निरन्तर और तीव्र प्रयास अपेक्षित
हैं। क्योंकि आलसी मनुष्य अपना पुरुषार्थ गवाँ देते हैं, जिससे
उन्हें कभी भी सफलता मिल नहीं सकती है। लक्ष्य तक नहीं पहुँचने के कारण उसे चारों तरफ
निराशा के ही दर्शन होते हैं। आलस्य तो परमेश्वर द्वारा प्रदत असीम सामर्थ्य (हाथ, पैर, आँख, कान इत्यादि) का अपमान है। तीव्र प्रयासरत पुरुष लक्ष्य
में सफल हो जाता है परन्तु ढुलमुल नीति वाला नहीं। कोई भी आलसी कभी भी महान् नहीं बन
सकता। जो अपने समय का एक भी क्षण व्यर्थ नहीं गँवाते, वे ही संसार
में हलचल मचाते हैं और मानव समाज की उन्नति करते हैं।
-- सैमुअल स्माइल
समय
समय का सुप्रबन्धन आपकी उम्र
को इन अर्थों में और अधिक बढ़ा देता है कि अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ आपके जीवन
में अति सहजता से जुड़ जाती है। धरती के सारे खज़ाने भी एक खोया हुआ क्षण वापस नहीं
ला सकता।
-- फ्रांसीसी लोकांकित
कोई ऐसी घड़ी नहीं जो गुजरे घण्टे
को फिर से बजा दे।
-- प्रेमचन्द
प्रयास की तीव्रता, लक्ष्य और महत्त्वाकांक्षा के साथ-साथ उद्देश्य तक पहुँचने
में समय का निर्धारण अवश्य होना चाहिए। कार्य का समापन निर्धारित काल खण्डों में क्रमश
पूरा होते रहना चाहिए।
फ्रांसिस वेकन ने कहा कि -- ``समय का चुनाव समय बचाता है''।
दिशा या लक्ष्य
की स्थिरता : यदि आप समय के साथ-साथ नहीं चलते हैं तो समय आपको अपने आप बाहर फैंक देगा। जिसे out of det कहा जाता है। क्या आप
out of det बनना पसन्द करेंगे। कई
ऐसे अस्थिर चित पुरुष होते है जो उमंग में अपने लक्ष्य का चुनाव तो कर लेते हैं, परन्तु जल्द ही वे अपना लक्ष्य बदल लेते हैं। थोड़े समय में फिर-फिर वे अपनी दिशा बदल लिया करते हैं। बार-बार दिशा का
निर्धारण मनुष्य की आन्तरिक शक्ति और अमूल्य समय को नष्ट कर देता है। फलत उसकी निर्धारित
अभिलाषा पर पानी फिर जाता है।
समय के छोटे-छोटे खंडों का भी सदुपयोग करें
महान् कार्य, शक्ति मात्र से नहीं, वरन् निरन्तर प्रयत्न से तथा अध्यावसाय
से होते हैं। जो व्यक्ति तीन घण्टे प्रतिदिन उत्साहपूर्वक चलेगा वह सात वर्ष में ही
विश्व की परिधि की दूरी तय कर लेगा।
-- उपेद्रनाथ अश्क
(शेष भाग 6 पर)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी
ईश्वरीय विश्व विद्यालय पर सपरिवार पधारें।
आप
सभी का तहे दिल से स्वागत है।


